जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। श्रीनगर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने घोषणा की है कि वह आगामी 3 नवंबर को अपनी संसदीय सीट और नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्राथमिक सदस्यता, दोनों से ही इस्तीफा सौंप देंगे। सांसद के इस अप्रत्याशित फैसले के बाद श्रीनगर संसदीय क्षेत्र में उपचुनाव की स्थिति पूरी तरह से तय मानी जा रही है।
सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने अपने रुख को पूरी तरह से स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह अपनी तय तारीख पर ही पद छोड़ेंगे। 3 नवंबर का दिन उनके परिवार के लिए बेहद भावुक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी तारीख को उनके पिता और वरिष्ठ शिया धर्मगुरु दिवंगत आगा सैयद मेहदी की शहादत की बरसी है। रुहुल्लाह ने जोर देकर कहा कि जब से उन्होंने अपने इस्तीफे का सार्वजनिक ऐलान किया है, तब से लेकर अब तक उनके फैसले में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं आया है और वह अपनी बात पर पूरी तरह से अडिग हैं।
इस्तीफे के फैसले पर कायम, आगे की रणनीति पर सस्पेंस
अपने निर्णय पर फिर से मुहर लगाते हुए सांसद रुहुल्लाह ने कहा कि जिस समय उन्होंने पद छोड़ने की घोषणा की थी, वह उस वक्त भी पूरी तरह से स्पष्ट थे और आज भी अपने रुख पर उतने ही पक्के हैं। उनके मुताबिक, बीते दिनों में परिस्थितियां बिल्कुल नहीं बदली हैं और हालात पहले जैसे ही बने हुए हैं। उन्होंने साफ किया कि उन्हें अपना फैसला वापस लेने या उसमें किसी तरह का बदलाव करने की कोई वजह नजर नहीं आती।
संसद और पार्टी से हटने के बाद की अपनी आगे की राजनीतिक रणनीति पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि 3 नवंबर को इस्तीफा देने के बाद जो भी हालात बनेंगे, उसी के हिसाब से वह अपना अगला कदम उठाएंगे।
पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से बढ़ता टकराव
आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी पिछले दो वर्षों से अपनी ही पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के रवैये से खासे असंतुष्ट नजर आ रहे हैं। अपने फैसले की वजहों को साझा करते हुए सांसद ने कहा कि पिछले दो सालों में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जिस तरह का आचरण दिखाया है, उसने उन्हें यह कठोर फैसला लेने पर मजबूर किया है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक जिम्मेदारियों को कमतर आंकने और साझा राजनीतिक एजेंडे को लेकर उनके द्वारा किए गए प्रयासों को बदनाम करने की कोशिशें की गईं। ऐसी स्थिति में पार्टी की सदस्यता बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है।
सांसद रुहुल्लाह लगातार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की कार्यप्रणाली की आलोचना करते आ रहे हैं। उनका कहना है कि उमर अब्दुल्ला उन चुनावी वादों को पूरा करने में नाकाम रहे हैं, जिनके आधार पर घाटी की जनता ने पार्टी को भारी जनादेश दिया था। उनका तर्क है कि संवैधानिक अधिकारों और जन-आकांक्षाओं को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस अपने घोषित राजनीतिक सिद्धांतों और वादों से भटक गई है।
दिसंबर 2024 में आरक्षण विवाद से उभरी थीं मतभेद की दरारें
नेशनल कॉन्फ्रेंस नेतृत्व और सांसद रुहुल्लाह के बीच का विवाद दिसंबर 2024 में उस समय खुलकर सरेआम आ गया था, जब वह श्रीनगर स्थित मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के आवास के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के बीच पहुंच गए थे। यह विरोध प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर की आरक्षण नीति में संशोधन की मांग को लेकर छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों द्वारा आयोजित किया गया था।
आंदोलनकारी युवाओं का तर्क था कि मौजूदा व्यवस्था के कारण सामान्य श्रेणी (ओपन-मेरिट) के अभ्यर्थियों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अवसर काफी सीमित हो गए हैं। इस मुद्दे पर सांसद रुहुल्लाह ने सीधे तौर पर छात्रों की मांगों का समर्थन किया और अपनी ही चुनी हुई सरकार पर इस समस्या के समाधान के लिए दबाव बनाया।
उन्होंने सरकार को कार्रवाई के लिए एक निश्चित समय-सीमा दी थी और चेतावनी दी थी कि अगर समस्या का हल नहीं निकला, तो वह आगे के आंदोलनों में भी शामिल होंगे। उनके इसी बागी रुख के कारण पार्टी नेतृत्व के साथ उनके मतभेद गहरे होते चले गए, जो आखिरकार उनके इस्तीफे के ऐलान तक पहुंच गए।
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