ब्रेन स्ट्रोक का बढ़ता खतरा और युवाओं में इसके मामले
आम धारणा यह है कि ब्रेन स्ट्रोक केवल वृद्ध लोगों की समस्या है, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट्स और डॉक्टरों का अनुभव कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। अब यह गंभीर स्थिति युवाओं और यहाँ तक कि 10 से 15 साल के बच्चों में भी देखी जा रही है। पटना के मेडिवर्सल हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट न्यूरोसर्जन, डॉ. मनीष कुमार धीरज ने चेतावनी दी है कि स्ट्रोक जैसी घटनाओं के प्रति लापरवाही बरतना जानलेवा हो सकता है। अचानक संतुलन बिगड़ना, चेहरे का एक तरफ झुक जाना, आंखों से धुंधला दिखना या बोलने में कठिनाई होना ऐसे संकेत हैं जिन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय रहते लक्षणों की पहचान करना और मरीज को तत्काल स्ट्रोक रेडी अस्पताल ले जाना ही मरीज की जान बचाने और लकवे जैसी स्थाई विकलांगता को रोकने का सबसे कारगर तरीका है।
क्या है ब्रेन स्ट्रोक और यह कैसे होता है?
डॉ. मनीष कुमार धीरज के अनुसार, जब मस्तिष्क की किसी नस में खून का प्रवाह पूरी तरह से बाधित हो जाता है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाने के कारण वहां रक्तस्राव शुरू हो जाता है, तो उसे ब्रेन स्ट्रोक कहा जाता है। मस्तिष्क का जो हिस्सा क्षतिग्रस्त होता है, वह शरीर के संबंधित अंगों की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करना बंद कर देता है, जिससे हाथ-पैरों में कमजोरी, बोलने की अक्षमता या लकवे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। स्ट्रोक को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है:
- इस्केमिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क तक जाने वाली रक्त वाहिका में थक्का जम जाता है, जिससे रक्त की आपूर्ति रुक जाती है।
- हेमरेजिक स्ट्रोक: इसमें मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण मस्तिष्क के भीतर ही रक्त का रिसाव होने लगता है।
इन दोनों स्थितियों का उपचार पूरी तरह से अलग होता है, इसलिए अस्पताल पहुँचने पर सही निदान के लिए तुरंत मेडिकल जांच बेहद जरूरी है।
लक्षणों की पहचान के लिए BE FAST मंत्र
डॉक्टर ने आम नागरिकों को स्ट्रोक के शुरुआती संकेतों को याद रखने के लिए BE FAST का एक सरल मंत्र दिया है। यदि किसी व्यक्ति में निम्नलिखित लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए:
- B (Balance): अचानक चलने में लड़खड़ाहट होना, शरीर का संतुलन खोना या तालमेल बिठाने में असमर्थ होना।
- E (Eyes): दृष्टि में अचानक बदलाव आना, धुंधला दिखाई देना या आंखों के सामने अंधेरा छा जाना।
- F (Face): चेहरे का एक हिस्सा लटक जाना या मुस्कुराते समय चेहरा एक तरफ से टेढ़ा महसूस होना।
- A (Arms): हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन महसूस होना, कमजोरी आना या एक हाथ उठाने में असमर्थता।
- S (Speech): बोलने में भारीपन आना, लड़खड़ाना या दूसरों की बातों को समझने में असमर्थ होना।
- T (Time): यदि इनमें से कोई भी संकेत दिखे, तो समय बर्बाद न करें। तुरंत एंबुलेंस बुलाएं और मरीज को उचित चिकित्सा केंद्र पहुंचाएं।
गोल्डन आवर: इलाज का निर्णायक समय
चिकित्सा विज्ञान में ब्रेन स्ट्रोक के मामले में समय को ही मस्तिष्क माना गया है, जिसे अंग्रेजी में टाइम इज ब्रेन कहा जाता है। यदि कोई मरीज लक्षण दिखने के पहले एक घंटे के भीतर, जिसे गोल्डन आवर कहा जाता है, अस्पताल पहुंच जाता है, तो उसकी रिकवरी की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। अस्पताल में मरीज का सीटी स्कैन या एमआरआई किया जाता है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि स्ट्रोक किस प्रकार का है। यदि मरीज इस्केमिक स्ट्रोक का शिकार है, तो आईवी थ्रोम्बोलिसिस थेरेपी जैसी दवाओं के जरिए रक्त के थक्के को घोलकर नस को खोलने का प्रयास किया जाता है। समय पर इलाज मिलने से मरीज न केवल पूरी तरह ठीक हो सकता है, बल्कि स्ट्रोक के संभावित स्थाई दुष्प्रभावों को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।
बच्चों में स्ट्रोक की चौंकाने वाली घटनाएं
डॉ. मनीष कुमार धीरज ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपने करियर में 10 साल के बच्चे में भी ब्रेन स्ट्रोक का मामला देखा है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 3 दिन के नवजात में ब्रेन हेमरेज के मामले भी सामने आते हैं, लेकिन उन्हें आमतौर पर जन्मजात कारणों से जोड़कर देखा जाता है। फिर भी, 10 से 15 साल के बच्चों में स्ट्रोक के मामले स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए एक शोध का विषय बन गए हैं। इतनी कम उम्र में इस गंभीर बीमारी का आना वाकई चिंताजनक है और इसके मूल कारणों की गहराई से जांच की जानी चाहिए।
बचाव के लिए क्या करें?
स्ट्रोक से सुरक्षित रहने के लिए जीवनशैली में सुधार और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता अनिवार्य है। डॉक्टर ने निम्नलिखित उपाय अपनाने का सुझाव दिया है:
- अपने ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर की नियमित जांच करवाते रहें।
- धूम्रपान और तंबाकू के किसी भी रूप का सेवन न करें, क्योंकि ये रक्त वाहिकाओं को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।
- मोटापे से बचें और नियमित रूप से व्यायाम और संतुलित खान-पान अपनाएं।
- शारीरिक सक्रियता बढ़ाएं और मानसिक तनाव कम करने का प्रयास करें।
- पर्याप्त नींद लें और अपनी दिनचर्या को अनुशासित रखें।
- लक्षण महसूस होने पर घर पर उपचार करने में समय नष्ट न करें।
डॉक्टर ने जोर देकर कहा कि स्ट्रोक के बाद का इलाज न केवल बहुत महंगा और लंबा हो सकता है, बल्कि यह परिवार पर भावनात्मक और आर्थिक बोझ भी डालता है। इसलिए, लक्षणों को पहचानना और समय रहते कदम उठाना ही सबसे बड़ी समझदारी है।
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