महज 12 साल और 4 महीने की उम्र में एक बच्ची ने अपने जीवन के आखिरी पलों में वह काम कर दिखाया, जो अक्सर बड़े-बुजुर्ग भी नहीं कर पाते. छत्तीसगढ़ की मासूम सुमना कुंडू एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी से लड़ते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गई, मगर उसके जाने के बाद दो परिवारों के जीवन में नई रोशनी लौट आई है. रायपुर एम्स में ब्रेन डेथ की पुष्टि होने के बाद उसके माता-पिता ने बेटी की दोनों किडनी दान करने का निर्णय लिया.
इस फैसले ने न सिर्फ दो गंभीर रूप से बीमार मरीजों को नई जिंदगी दी, बल्कि पूरे प्रदेश में अंगदान को लेकर एक प्रेरक संदेश भी फैलाया. चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की घटनाएं समाज में जागरूकता बढ़ाने और अंगदान के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करने में अहम भूमिका निभाती हैं.
सुमना की कहानी सिर्फ एक चिकित्सकीय सफलता तक सीमित नहीं है, यह मानवता, संवेदनशीलता और त्याग की एक जीती-जागती मिसाल भी है. अपनी बेटी को खोने के गहरे दुख के बावजूद लक्ष्मण कुंडू और सरस्वती कुंडू ने जो साहस दिखाया, वह असाधारण है. रायपुर एम्स के डॉक्टरों, ट्रांसप्लांट टीम और SOTTO छत्तीसगढ़ के तालमेल से दोनों किडनी सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित की गईं. इस पूरी प्रक्रिया ने यह सिद्ध कर दिया कि मृत्यु के बाद भी जीवन की कड़ी आगे बढ़ सकती है. सुमना भले ही अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उसकी दी हुई जिंदगी दो लोगों की धड़कनों में हमेशा जीवित रहेगी.
दुर्लभ बीमारी से जूझ रही थी सुमना
सुमना कुंडू को Pyknodysostosis with Intracranial Hypertension and Bilateral Optic Atrophy जैसी दुर्लभ बीमारी थी. 29 मई 2026 को उसे एम्स रायपुर में भर्ती कराया गया था. नौ दिनों तक आईसीयू में वेंटिलेटर सपोर्ट पर उसका इलाज चलता रहा. डॉक्टरों की टीम ने हर संभव कोशिश की, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और तय चिकित्सकीय प्रक्रिया के बाद उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया.
माता-पिता ने लिया सबसे कठिन फैसला
ब्रेन डेथ की पुष्टि होने के बाद अंग प्रत्यारोपण समन्वयकों ने परिवार को अंगदान के महत्व के बारे में समझाया. बेटी को खोने के असहनीय दर्द के बीच भी माता-पिता ने दोनों किडनी दान करने पर सहमति जता दी. डॉक्टरों के अनुसार, ऐसे फैसले बेहद दुर्लभ होते हैं और कई लोगों को नया जीवन दे सकते हैं.
दो मरीजों को मिला जीवनदान
SOTTO छत्तीसगढ़ के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रतीक्षा सूची में शामिल मरीजों को किडनी आवंटित की गई. पहली किडनी रायपुर के 15 वर्षीय किशोर को मिली, जो बीते तीन वर्षों से डायलिसिस पर निर्भर था. वहीं दूसरी किडनी 45 वर्षीय मरीज को लगाई गई, जो मूल रूप से मध्य प्रदेश के बालाघाट का निवासी है और पांच वर्षों से डायलिसिस करा रहा था. दोनों मरीजों की सर्जरी सफल रही और वे अब स्वस्थ हो रहे हैं.
कई विभागों के तालमेल से मिली सफलता
यह प्रत्यारोपण प्रक्रिया एम्स रायपुर के यूरोलॉजी विभाग में डॉ. अमित आर. शर्मा के नेतृत्व में पूरी हुई. नेफ्रोलॉजी, एनेस्थीसिया, न्यूरोसर्जरी, फोरेंसिक मेडिसिन और PICU समेत कई विभागों ने मिलकर इस मिशन को कामयाब बनाया. चिकित्सकों का कहना है कि समय पर किया गया समन्वय अंग प्रत्यारोपण की सफलता का सबसे अहम हिस्सा होता है.
गार्ड ऑफ ऑनर के साथ अंतिम विदाई
सुमना के असाधारण योगदान को सम्मान देने के लिए उसे गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया. अंतिम विदाई के समय वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं. यह सम्मान केवल एक बच्ची के लिए नहीं था, बल्कि उस सोच के लिए था जिसने दो परिवारों को नई उम्मीद दी.
अंगदान क्यों है इतना जरूरी
भारत में हजारों मरीज किडनी, लीवर, हृदय और अन्य अंगों के प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक एक मृत दाता आठ लोगों तक की जान बचा सकता है. इसके बावजूद देश में अंगदान की दर अब भी काफी कम है. इस दिशा में जागरूकता और परिवार की सहमति सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
अंग प्रत्यारोपण क्या है?
अंग प्रत्यारोपण (Organ Transplantation) दान किए गए स्वस्थ अंग को प्राप्तकर्ता (Recipient) के शरीर में सर्जिकल तरीके से लगाने की प्रक्रिया है. यह अंतिम चरण की बीमारी (End-Stage Organ Failure) से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती है.
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