बस्तर दशहरा की रहस्यमयी निशा जात्रा: 600 साल से क्यों दी जा रही है 11 बकरों की बलि

छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा के दौरान निशा जात्रा की प्राचीन परंपरा निभाई गई। माना जाता है कि इस तांत्रिक रस्म से राजा-महाराजा अपने राज्य को बुरी शक्तियों से सुरक्षित रखते थे।

बस्तर की प्राचीन परंपरा

छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा अपनी अनोखी मान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इसी कड़ी में मंगलवार की आधी रात को बस्तर दशहरा की सबसे महत्वपूर्ण और गुप्त मानी जाने वाली रस्म 'निशा जात्रा' को विधिवत पूरा किया गया। शहर के अनुपमा चौक पर स्थित गुड़ी मंदिर में आयोजित इस रस्म के दौरान मां मावली को भोग अर्पित किया गया।

निशा जात्रा का रहस्य और महत्व

निशा जात्रा को तांत्रिक क्रियाओं से जुड़ी रस्म माना जाता है। प्राचीन किंवदंतियों के अनुसार, राजा-महाराजा इस रस्म को खास तौर पर अपने राज्य की रक्षा के लिए करते थे। ऐसी मान्यता है कि इस तांत्रिक पूजा के माध्यम से बुरी प्रेत आत्माओं को दूर रखा जाता था और राज्य में शांति व समृद्धि बनी रहती थी। परंपरा के अनुसार, इस अनुष्ठान में कुल 11 बकरों की बलि दी जाती है। यह रस्म महाअष्टमी और नवमी की मध्यरात्रि को पूरी की जाती है। इस वर्ष भी बस्तर राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों और गाजे-बाजे के साथ पैदल चलकर गुड़ी मंदिर पहुंचे थे।

600 साल पुराना इतिहास

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने इस परंपरा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह रस्म लगभग 600 साल पुरानी है। उन्होंने कहा कि बलि की यह प्रक्रिया देवी को प्रसन्न करने के लिए की जाती है, ताकि राज्य पर कोई संकट न आए। कमलचंद भंजदेव के अनुसार, पहले के समय में निशा जात्रा को काफी गुप्त रखा जाता था, लेकिन समय के बदलाव के साथ अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में आमजन भी इसमें शामिल होते हैं।

बदलता स्वरूप और परंपरा

कमलचंद भंजदेव ने स्पष्ट किया कि पूजा-अर्चना और बलि की परंपरा आज भी उसी निष्ठा के साथ जारी है। 'निशा जात्रा' का शाब्दिक अर्थ ही रात की यात्रा है, क्योंकि यह पूरी परंपरा आधी रात यानी 12 बजे के बाद ही संपन्न होती है। आज भी इस दिन पूरे बस्तर क्षेत्र में बलि चढ़ाने की परंपरा का पालन किया जाता है। राजपरिवार का मानना है कि इस रस्म के पूरा होने के बाद ही बस्तर में खुशहाली और सुख-शांति का वातावरण बना रहता है।

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