ऋषिकेश के तपोवन में बंगाली परंपरा से सजता है मां दुर्गा का दरबार, बंगाल से आते हैं पंडित और मूर्तिकार

उत्तराखंड के ऋषिकेश स्थित तपोवन में शारदीय नवरात्रि के दौरान पश्चिम बंगाल की समृद्ध धार्मिक परंपराओं की अनूठी झलक देखने को मिलती है, जहां बंगाल से आए कारीगर और पुजारी पूरे विधि-विधान के साथ पूजा संपन्न कराते हैं।

देवभूमि में बंगाल की धार्मिक परंपरा का अद्भुत संगम

उत्तराखंड की पावन नगरी ऋषिकेश में नवरात्रि के पावन अवसर पर जगह-जगह मां भगवती के भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। हालांकि, लक्ष्मण झूला क्षेत्र के तपोवन में आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा की एक विशेष और विशिष्ट पहचान है। यहां का पूजा आयोजन स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी भारी आकर्षण का केंद्र रहता है। इस पंडाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां मां दुर्गा की आराधना पूरी तरह से पश्चिम बंगाल के पारंपरिक रीति-रिवाजों और धार्मिक पद्धतियों के अनुसार संपन्न की जाती है।

इस अनूठे आयोजन को पूरी तरह प्रामाणिक और बंगाली संस्कृति के अनुरूप बनाए रखने के लिए विशेष रूप से पश्चिम बंगाल से पंडित और मूर्तिकार ऋषिकेश पहुंचते हैं। प्रतिमा निर्माण की शुरुआती प्रक्रिया से लेकर अंतिम पूजा विधान तक, हर चरण में बंगाल की समृद्ध संस्कृति और आस्था की स्पष्ट छाप देखने को मिलती है।

1989 से जारी है परंपरा, मनाया जा रहा 38वां वार्षिकोत्सव

श्री दुर्गा पूजा समिति, तपोवन के सचिव शंकर कुमार राय ने आयोजन के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि लक्ष्मण झूला के तपोवन स्थित इस परिसर में पहली बार वर्ष 1989 में दुर्गा पूजा पंडाल स्थापित किया गया था। इस वर्ष यहां शारदीय नवरात्रि का 38वां वार्षिकोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और भक्तिभाव के साथ मनाया जा रहा है।

समिति के सचिव के अनुसार, इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत यहां की अनुष्ठान पद्धति है, जो पूरी तरह से पश्चिम बंगाल की सनातन परंपराओं पर आधारित है। पूजा में इस्तेमाल होने वाली मां दुर्गा की मूर्ति को पारंपरिक शैली में निर्मित किया जाता है। इस दिव्य प्रतिमा में मां दुर्गा के साथ असुर राज महिषासुर तथा अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां भी शास्त्रों के अनुसार उकेरी जाती हैं। बंगाल से आए कुशल मूर्तिकार कई दिन पहले ऋषिकेश पहुंचकर मिट्टी और पारंपरिक सामग्रियों से मां का भव्य स्वरूप गढ़ते हैं।

गढ़वाली और बंगाली समुदाय का अद्भुत मेल

तपोवन में आयोजित होने वाली इस दुर्गा पूजा की एक और खास बात समाज के विभिन्न वर्गों का एकजुट होना है। सचिव शंकर कुमार राय के मुताबिक, इस भव्य आयोजन में केवल बंगाली समाज ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्थानीय गढ़वाल क्षेत्र के लोग भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। यह आयोजन दो अलग-अलग संस्कृतियों और समुदायों के बीच सौहार्द एवं धार्मिक एकता का प्रतीक बन चुका है।

पंडाल निर्माण, सजावट और व्यवस्था से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों तक, सभी तैयारियों में स्थानीय गढ़वाली और बंगाली समुदाय के सदस्य एक साथ मिलकर काम करते हैं। इसके चलते पूजा पंडाल में हर दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

षष्ठी से दशमी तक के अनुष्ठान और 40 मिनट की विशेष संधि पूजा

तपोवन के इस दुर्गा पूजा पंडाल में नवरात्रि के दौरान षष्ठी तिथि से लेकर दशमी तिथि तक, यानी कुल पांच से छह दिनों तक विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला चलता है। इस दौरान अष्टमी और नवमी तिथि को होने वाले विशेष अनुष्ठानों का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है।

इस आयोजन के सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण आकर्षणों में 'संधि पूजा' शामिल है। सचिव ने इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया:

  • 40 मिनट का विशेष समय: अष्टमी तिथि के समापन और नवमी तिथि के शुभारंभ के बीच के 40 मिनट की अवधि में संधि पूजा का आयोजन किया जाता है।
  • पौराणिक संदर्भ: यह 40 मिनट की अवधि उस ऐतिहासिक और पौराणिक क्षण की याद दिलाती है जब मां भगवती दुर्गा ने महिषासुर का वध करके अधर्म का नाश किया था।
  • अष्टमी-नवमी की महत्ता: इस 40 मिनट की संधि पूजा के दौरान बेहद कठिन और शास्त्रीय विधियों से मंत्रोच्चार किया जाता है।
  • दशमी और सिंदूर खेला: विजयादशमी के दिन महिलाएं पारंपरिक तरीके से 'सिंदूर खेला' की रस्म निभाती हैं, जिसमें मां दुर्गा को विदाई दी जाती है।
  • गंगा विसर्जन: मां दुर्गा को मायके से विदा करने की भावना के साथ उनकी प्रतिमा का पवित्र गंगा जी में विसर्जन किया जाता है।

इस प्रकार, ऋषिकेश के तपोवन में आयोजित यह दुर्गा पूजा न केवल धार्मिक अनुष्ठानों की दृष्टि से विशेष है, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की समृद्ध कला, संस्कृति और परंपरा को गंगा किनारे देवभूमि में जीवंत करने का एक अद्वितीय माध्यम भी बन चुकी है।

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