60 साल की उम्र में मिट्टी के चूल्हे पर जलेबी बनाकर मिसाल बनीं सबंदो बाई, संघर्ष से बदल दी जिंदगी

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में 60 वर्षीय सबंदो बाई मिट्टी के चूल्हे पर देसी जलेबी बनाकर सम्मान की आजीविका कमा रही हैं। कभी मजदूरी करके दो वक्त की रोटी के लिए जूझने वाली अम्मा अब अपनी मेहनत के दम पर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं।

सरगुजा की जलेबी वाली अम्मा का प्रेरणादायक सफर

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के आमगांव की रहने वाली 60 वर्षीय सबंदो बाई आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। ढलती उम्र में भी उनका हौसला और काम करने का जज्बा युवाओं के लिए एक बड़ी मिसाल है। सबंदो बाई मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी की आंच पर गरमागरम देसी जलेबी बनाती हैं, जिसका स्वाद लोगों को इतना पसंद आता है कि दिनभर में उनकी सारी जलेबियां हाथों-हाथ बिक जाती हैं। उनकी यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है, बल्कि इसके पीछे वर्षों का कड़ा संघर्ष और उनकी अटूट मेहनत छिपी है।

मजदूरी से शुरू हुआ था संघर्ष

सबंदो बाई ने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उनका जीवन हमेशा से इतना आसान नहीं था। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें मजदूरी करनी पड़ती थी और परिवार का पेट पालने के लिए भी भारी मशक्कत करनी होती थी। आर्थिक तंगी इतनी ज्यादा थी कि कई बार उन्हें और उनके बच्चों को दो वक्त का पेट भर खाना भी नसीब नहीं होता था। ऐसे कठिन हालात में भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद को जीवित रखा।

दूसरों को देखकर सीखी हुनर की कला

पिछले करीब 10 वर्षों से सबंदो बाई अपने इस छोटे से रोजगार को चला रही हैं। सड़क किनारे अपनी एक छोटी सी टपरी लगाकर उन्होंने काम शुरू किया था। शुरुआत में वह केवल मजदूरी ही करती थीं, लेकिन इस दौरान उन्होंने आसपास के लोगों को भजिया और जलेबी बनाते हुए देखा और उनसे प्रेरणा ली। धीरे-धीरे उन्होंने खुद जलेबी बनाना सीखा और अपनी टपरी पर भजिया के साथ-साथ जलेबी का काम भी शुरू कर दिया। उनके लिए यह सफर आसान नहीं था, लेकिन अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने इसे संभव कर दिखाया। आज उन्हें अपनी रोजी-रोटी के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

मिट्टी के चूल्हे पर बनता है देसी स्वाद

सबंदो बाई की जलेबी की सबसे बड़ी खासियत उसे पकाने का तरीका है। आधुनिक गैस चूल्हों के दौर में भी वह पारंपरिक मिट्टी के चूल्हे का ही इस्तेमाल करती हैं। लकड़ी की आंच पर बनी जलेबी का स्वाद कहीं अधिक सोंधा और लाजवाब होता है। जलेबी तैयार करने की उनकी प्रक्रिया काफी व्यवस्थित है। सबसे पहले मैदे का सही घोल तैयार किया जाता है, उसके बाद इसे गर्म तेल में तला जाता है और फिर मीठी चाशनी में अच्छी तरह डुबोया जाता है। सबंदो बाई का मानना है कि यदि जलेबी को सही तरीके से चाशनी में न डुबोया जाए, तो उसका असली स्वाद नहीं उभरता। इसी पारंपरिक पद्धति के कारण उनकी जलेबियां ग्राहकों की पहली पसंद बनी हुई हैं।

पति के निधन के बाद टपरी ही बनी सहारा

सबंदो बाई के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, जिसमें उनके पति का असमय निधन सबसे दुखद था। पति के जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी पूरी तरह से उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उनकी यही छोटी सी टपरी उनके जीवित रहने का और सम्मान के साथ जीने का एकमात्र जरिया बनी। उन्होंने किसी भी विपरीत परिस्थिति में हार नहीं मानी। भले ही उनका होटल किसी बड़े भवन में नहीं है और संसाधन काफी सीमित हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी और मेहनत ने उन्हें आर्थिक रूप से स्थिर कर दिया है। सरकार से मिलने वाले राशन से भी उन्हें काफी मदद मिलती है, जिससे अब उनकी स्थितियां पहले से कहीं बेहतर हैं।

युवाओं को सबंदो बाई की नसीहत

आज की युवा पीढ़ी के लिए सबंदो बाई का जीवन एक खुली किताब की तरह है। उन्होंने युवाओं को स्पष्ट संदेश दिया है कि जीवन में कभी भी गलत रास्तों या नशे की ओर नहीं मुड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि नशे में पैसा और सेहत बर्बाद करने से बेहतर है कि इंसान कोई हुनर सीखे और अपना छोटा-मोटा रोजगार शुरू करे। सबंदो बाई का मानना है कि अपनी मेहनत से कमाए गए पैसे का आनंद ही अलग होता है। वह कहती हैं कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए बस कड़ी मेहनत और ईमानदारी की आवश्यकता होती है।

हुनर हो तो छोटी टपरी भी बदल सकती है तकदीर

सबंदो बाई की कहानी यह साबित करती है कि व्यापार शुरू करने के लिए हमेशा लाखों के निवेश या बहुत बड़े दुकान की जरूरत नहीं होती है। यदि आपके पास हुनर है, मेहनत करने का जज्बा है और कुछ कर गुजरने की इच्छाशक्ति है, तो सड़क किनारे की एक छोटी सी टपरी भी आपकी जिंदगी को पूरी तरह बदल सकती है। 60 वर्ष की उम्र में भी सबंदो बाई का सक्रिय रहना और दिनभर मेहनत करना हम सभी के लिए प्रेरणा है। उनका यह सफर ग्रामीण महिलाओं और उन सभी लोगों के लिए एक मिसाल है जो संसाधन न होने का बहाना बनाकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।

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