जब विकेटकीपर ने छोड़ा साथ, तो ऐसे बदली महेंद्र सिंह धोनी की किस्मत; स्कूल के दिनों का अनसुना किस्सा

रांची के जवाहर विद्या मंदिर में पढ़े महेंद्र सिंह धोनी के बचपन के संघर्ष और उनके खेल के प्रति समर्पण का खुलासा उनके बैचमेट श्री राम सिंह ने किया है। जानिए कैसे एक विकेटकीपर के धोखा देने के बाद माही की किस्मत का सितारा चमका।

रांची के स्कूल से शुरू हुई सफलता की कहानी

रांची के जवाहर विद्या मंदिर में पढ़ाई करने वाले महेंद्र सिंह धोनी के शुरुआती जीवन और उनके संघर्षों को लेकर उनके बैचमेट श्री राम सिंह ने कई अनसुनी बातें साझा की हैं। 90 के दशक के इस बैच के छात्रों के हालिया मिलन समारोह में श्री राम सिंह ने अपने पुराने दोस्त के बारे में खुलकर चर्चा की। उन्होंने न केवल धोनी के स्कूल के दिनों की दिनचर्या के बारे में बताया, बल्कि उस घटना का भी जिक्र किया जिसने धोनी को विकेटकीपिंग की दुनिया में प्रवेश करने के लिए मजबूर किया और आगे चलकर उन्हें क्रिकेट का महानतम खिलाड़ी बना दिया।

तपती धूप में घंटों तक पसीना बहाते थे धोनी

श्री राम सिंह ने धोनी की मेहनत के बारे में एक बड़ा दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि धोनी अपने खेल को लेकर कितने गंभीर थे, यह बात जमशेदपुर के एक दौरे के दौरान साफ हो गई थी। श्री राम के अनुसार, एक दिन उन्होंने देखा कि धोनी तपती धूप में, कानों में हेडफोन लगाकर चुपचाप रनिंग कर रहे थे। श्री राम ने गौर किया कि वह लगभग 2.30 घंटे तक बिना रुके लगातार दौड़ते रहे। पसीने से पूरी तरह भीग जाने के बावजूद धोनी की मेहनत में कोई कमी नहीं थी। उनका यही अनुशासन आगे चलकर उन्हें एक एथलीट के रूप में दुनिया के सामने लेकर आया।

कैप्टन कूल का शांत स्वभाव बचपन से ही था

धोनी के स्वभाव पर चर्चा करते हुए श्री राम सिंह ने बताया कि वह स्कूल के दिनों में भी काफी शांत रहते थे। वह किसी भी तरह के झगड़ों या विवादों से दूर रहना पसंद करते थे। वे अक्सर मेकॉन ग्राउंड में अभ्यास के बाद पास के ही एक होटल में स्नैक्स का आनंद लेते थे। धोनी को बचपन से ही दूध पीना बहुत पसंद था। उनके इसी संयमित और शांत स्वभाव के कारण उन्हें हमेशा से एक सुलझा हुआ इंसान माना जाता था। मैदान पर तनावपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद धैर्य बनाए रखने की उनकी कला बचपन से ही उनमें मौजूद थी, जिसे आज पूरी दुनिया 'कैप्टन कूल' के नाम से जानती है।

विकेटकीपिंग का अनपेक्षित सफर

धोनी के विकेटकीपर बनने के पीछे की कहानी बेहद रोमांचक है। श्री राम बताते हैं कि उस समय उनकी टीम में पहले से ही एक विकेटकीपर था, लेकिन ऐन वक्त पर उसने टीम का साथ छोड़ दिया। उस विकेटकीपर के माता-पिता ने उसे खेलने से मना कर दिया और केवल पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने का निर्देश दिया। टीम को अचानक एक विकेटकीपर की जरूरत थी। तभी वहां मौजूद बनर्जी सर ने धोनी को फुटबॉल में गोलकीपिंग करते हुए देखा था। उन्होंने धोनी को सुझाव दिया कि वे कुछ मैचों के लिए विकेटकीपिंग संभालें। धोनी ने उस जिम्मेदारी को स्वीकार किया और उसके बाद जो हुआ वह इतिहास बन गया।

विपक्षी टीम के लिए खौफ का दूसरा नाम

स्कूल के दिनों में इंटर-स्कूल मैचों के दौरान विरोधी टीमें धोनी के विकेट के पीछे खड़े होने से घबराती थीं। धोनी की तकनीक इतनी सटीक थी कि बल्लेबाज आउट होने से डरते थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे तेज से तेज गेंदों को भी विकेट के बेहद करीब खड़े होकर पकड़ते थे। उनकी फुर्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पलक झपकते ही वे विकेट बिखेर देते थे। धोनी की यह काबिलियत उस समय भी विरोधियों के मन में खौफ पैदा करने के लिए काफी थी।

माता-पिता का अटूट समर्थन

धोनी की सफलता में उनके माता-पिता की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। श्री राम सिंह ने याद करते हुए बताया कि धोनी के माता-पिता उनके हर छोटे-बड़े मैच में मैदान पर मौजूद रहते थे। चाहे इंटर-स्कूल मैच हो या कोई स्थानीय मुकाबला, धोनी के माता-पिता का सहयोग उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करता था। अन्य बच्चों के अभिभावक भले ही हर मैच में न आ पाएं, लेकिन धोनी के माता-पिता उनके खेल के प्रति हमेशा तत्पर रहते थे, जिसने धोनी को मानसिक रूप से बहुत मजबूत बनाया।

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