विरोध की आवाज दबाने का आरोप
दिल्ली के जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में मान्यता देने पर रोक लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) ने इस कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया है। पार्टी ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में आरोप लगाया कि केंद्र सरकार सत्तावाद को बढ़ावा दे रही है और जनता के विरोध के स्वर को व्यवस्थित तरीके से कुचलने का काम कर रही है। यह कार्रवाई 14 अक्टूबर को सामने आई, जिसके बाद से ठाकरे गुट ने सत्ताधारी दल पर जमकर निशाना साधा है।
प्रशासनिक रणनीति का हिस्सा
ठाकरे गुट का मानना है कि जंतर-मंतर से प्रदर्शन का दर्जा हटाना कोई साधारण प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। पार्टी के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य जन आंदोलनों की गूंज को संसद और राष्ट्रीय चेतना से दूर रखना है। नए आदेशों के बाद विरोध प्रदर्शनों को शहर के मुख्य केंद्रों से दूर धकेल दिया गया है, जो अब आम लोगों की पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। पार्टी द्वारा गिनाई गई नई निर्धारित जगहें इस प्रकार हैं:
- रामलीला मैदान जो प्रदर्शन स्थल से लगभग 4 किमी दूर है।
- शाहदरा का सीबीडी ग्राउंड जो करीब 12 किमी की दूरी पर स्थित है।
- बुराड़ी ग्राउंड, जो केंद्र से 20-21 किमी दूर है।
लोकतांत्रिक अधिकारों का व्यावसायीकरण
संपादकीय में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि विरोध प्रदर्शन करना अब एक महंगा सौदा बनता जा रहा है। रामलीला मैदान जैसे स्थलों के उपयोग के लिए प्रतिदिन 1.5 लाख रुपए से अधिक का शुल्क देना पड़ता है। इसके अलावा, महीनों पहले बुकिंग करनी पड़ती है और अक्सर ये स्थान धार्मिक आयोजनों या सत्तारूढ़ दल के कार्यक्रमों के लिए आरक्षित रहते हैं। शिवसेना का कहना है कि शांतिपूर्ण सभा करना एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे इस तरह से नियंत्रित करना गलत है। यह प्रशासनिक कार्रवाई उन प्रदर्शनों के बाद तेज हुई है, जिनमें चुनावी अखंडता पर सवाल उठाए गए थे और भारी सुरक्षा तैनाती की गई थी।
सरकार के अंत की उलटी गिनती
विपक्षी नेताओं ने भी इस कार्रवाई की निंदा की है, जिनमें राहुल गांधी का नाम प्रमुख है। जंतर-मंतर को प्रदर्शन के लिए प्रतिबंधित करने के इस फैसले के खिलाफ अब कानूनी चुनौतियां भी दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गई हैं। उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि जब कोई सरकार अपनी ही जनता से डरने लगे, तो उसके अंत की उलटी गिनती शुरू हो जाती है। पार्टी का स्पष्ट मानना है कि सरकार असहमति के स्वरों को शहर की सीमाओं से बाहर धकेलकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है, जो लोकतंत्र के स्वस्थ होने के संकेत नहीं हैं।
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