पाकिस्तान में बढ़ता राजनीतिक तनाव
पाकिस्तान इस समय एक बेहद गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट से गुजर रहा है। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ और मौजूदा शहबाज शरीफ की सरकार के बीच की तनातनी अब सड़कों पर खुलकर सामने आ गई है। खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आपातकाल लगाने और गवर्नर शासन लागू करने के सरकार के फैसले ने आग में घी डालने का काम किया है। इस स्थिति के चलते पेशावर की सड़कों पर स्थिति तनावपूर्ण हो गई है, जहां इमरान खान के समर्थक बड़ी संख्या में जमा होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने पेशावर में गवर्नर हाउस को पूरी तरह से घेर लिया है, जिससे वहां हाई वोल्टेज ड्रामा जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी
पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ ने सरकार के इस कदम को पूरी तरह से गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया है। पार्टी के केंद्रीय सूचना सचिव शेख वकास अकरम ने पुष्टि की है कि पीटीआई की कानूनी टीम ने आपातकाल और गवर्नर शासन के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए पूरी तैयारी कर ली है। पार्टी अध्यक्ष बैरिस्टर गोहर अली खान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी सूरत में पीछे नहीं हटेंगे और इस लड़ाई को पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनी तरीके से अदालत के भीतर लड़ा जाएगा। अदालत का इस पूरे मामले पर क्या रुख रहता है, यह पाकिस्तान के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होने वाला है।
लॉन्ग मार्च और इमरान खान की रिहाई की मांग
दरअसल, यह सारा विवाद इमरान खान की रिहाई के लिए निकाले जा रहे लॉन्ग मार्च से जुड़ा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान पिछले 3 साल से अधिक समय से जेल में बंद हैं। उन्हें रिहा कराने के दबाव के रूप में पीटीआई ने इस्लामाबाद की ओर एक बड़ा मार्च शुरू किया था। 10 अक्टूबर को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल घोषित करने के साथ ही गवर्नर राज लागू कर दिया गया, जिससे वहां पीटीआई की चुनी हुई सरकार को निलंबित कर दिया गया। यह प्रांत साल 2013 से पीटीआई के ही शासन के अधीन था, जिसके अचानक निलंबित होने से पार्टी कार्यकर्ताओं में जबरदस्त गुस्सा है।
सरकार का तर्क और आतंकवाद का मुद्दा
गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने संघीय सरकार के इस सख्त फैसले का बचाव करते हुए दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वा में आतंकवाद से निपटने के लिए संघीय शासन अनिवार्य था। पेशावर में एक बयान के दौरान नकवी ने तर्क दिया कि यह प्रांत अफगानिस्तान के साथ अपनी सीमा साझा करता है और जब तक वहां की स्थानीय सरकार का रवैया सकारात्मक न हो, तब तक आतंकवाद के खिलाफ युद्ध जीतना नामुमकिन है। उन्होंने कहा कि प्रांत में संसाधनों की कमी नहीं थी, लेकिन सही नेतृत्व और इच्छाशक्ति का अभाव था। वहीं दूसरी ओर, राज्य के गृह मंत्री तलाल चौधरी ने जानकारी दी कि बर्खास्त किए गए मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी और उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों को निवारक हिरासत में ले लिया गया है, क्योंकि वे खुद इस्लामाबाद मार्च का नेतृत्व कर रहे थे, जिसने सरकार को कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर किया।
संवैधानिक प्रावधान और भविष्य की अटकलें
सरकार के कानून मंत्री आजम नजीर तरार ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि संविधान के अनुच्छेद 232 के तहत यह आपातकाल पूरे खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में प्रभावी है। सूचना मंत्री अताउल्लाह तरार ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने दावा किया कि सरकार ने आपातकाल लगाने से पहले पीटीआई के साथ कई दौर की बातचीत की थी ताकि आतंकवाद विरोधी उपायों पर आम सहमति बन सके, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। उन्होंने आरोप लगाया कि दक्षिणी जिलों में आतंकवादी प्रशासन का ही एक अनौपचारिक हिस्सा बन चुके थे। हालांकि, पीटीआई ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पार्टी को कुचलने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश बताया है। कानून मंत्री ने यह भी बताया कि संविधान के अनुसार इस आपातकाल या गवर्नर शासन को अधिकतम 6 महीने तक बढ़ाया जा सकता है, जिसकी हर 2 महीने में संसद के संयुक्त सत्र द्वारा समीक्षा की जाएगी। सरकार ने फिलहाल यह साफ किया है कि वे इस मार्च को इस्लामाबाद तक पहुंचने की अनुमति किसी भी कीमत पर नहीं देंगे, जिससे आने वाले दिनों में पाकिस्तान में टकराव और अधिक बढ़ने की आशंका है।
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