भारत की प्रगति और वैश्विक जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 13 अक्टूबर को एक महत्वपूर्ण संबोधन के दौरान वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका और उसकी रणनीतिक दृष्टि को साझा किया। भू-राजनीतिक अस्थिरता और तमाम आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही दुनिया के बीच प्रधानमंत्री ने भारत को एक स्थिर और भरोसेमंद भागीदार के रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि भारत की आर्थिक वृद्धि किसी अन्य राष्ट्र को पीछे छोड़ने या उसकी कीमत पर नहीं हो रही है, बल्कि भारत दुनिया के साथ मिलकर और दुनिया के कल्याण को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ रहा है।
मजबूत आर्थिक आधार और सुधार
ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने देश की अर्थव्यवस्था के आंकड़ों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि मौजूदा वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत ने 7.8 प्रतिशत की प्रभावशाली आर्थिक विकास दर दर्ज की है। यह वृद्धि केवल एक आकड़ा नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों से किए गए ठोस सुधारों और मजबूत बुनियादी ढांचे का बड़ा हाथ है। उन्होंने कहा कि भारत अब अपनी आर्थिक ताकत और सुधारों के जरिए दुनिया के सामने एक उदाहरण पेश कर रहा है।
अपनी बात को पुख्ता करते हुए उन्होंने निम्नलिखित सुधारों और उपलब्धियों को रेखांकित किया:
- भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 700 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है।
- कराधान, दिवाला प्रक्रिया और श्रम कानूनों में किए गए बदलावों ने व्यापार को आसान बनाया है।
- देश का चालू खाते का घाटा जो करीब 12 से 13 साल पहले 4 प्रतिशत से अधिक था, वह अब घटकर केवल 0.5 प्रतिशत के आसपास रह गया है।
शक्ति का संतुलित उपयोग
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज के दौर में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि किसी देश के पास कितनी शक्ति है। महत्वपूर्ण यह है कि वह अपनी शक्ति और तकनीक का उपयोग किस प्रकार कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि शक्ति का संतुलन बनाए रखना मौजूदा दौर की सबसे बड़ी मांग है। भारत इस मामले में बिल्कुल अलग मिजाज और दृष्टिकोण के साथ चल रहा है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, 'असली प्रश्न यह नहीं है कि किसके पास अधिक ताकत है, बल्कि असली सवाल यह है कि उस ताकत का इस्तेमाल किस तरह से किया जा रहा है?'
तकनीक और सार्वजनिक बुनियादी ढांचा
भारत की डिजिटल क्रांति का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश अपने डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप कल्चर और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने इस बात पर गर्व जताया कि भारत केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपनी डिजिटल पहचान, भुगतान प्रणाली और अन्य सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के अनुभवों को अन्य देशों के साथ, विशेषकर ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) के साथ साझा कर रहा है।
भू-राजनीतिक चुनौतियों पर चिंता
प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों को लेकर आगाह भी किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा संसाधन, महत्वपूर्ण खनिज, भुगतान प्रणालियां और आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल दबाव बनाने के हथकंडों के रूप में किया जाने लगा है। इन परिस्थितियों में भरोसेमंद आर्थिक भागीदारों और मजबूत प्रणालियों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। उन्होंने जोर दिया कि सुधार भारत के लिए कोई मजबूरी नहीं, बल्कि उनका संकल्प है।
वैश्विक सहयोग का आह्वान
संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान किया कि जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, AI (कृत्रिम मेधा) और आर्थिक सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों पर आपसी सहयोग को और अधिक गहरा करने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि भारत अपनी प्रगति के माध्यम से दुनिया को समाधान, तकनीक और कुशल प्रतिभा उपलब्ध कराने के लिए तैयार है। यह एक ऐसी नीति है जहां भारत की उन्नति दुनिया की उन्नति के साथ जुड़ी हुई है। भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह न केवल अपने विकास को प्राथमिकता देता है, बल्कि वैश्विक स्थिरता का भी एक आधार स्तंभ बनकर उभरा है।
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