जंतर मंतर पर प्रदर्शनों की राह बंद, राहुल गांधी की राजनीति पर बड़ा संकट और कॉकरोच पार्टी को तगड़ा झटका

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में जंतर मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाकर विरोध की राजनीति करने वाले दलों के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। वहीं, राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा किए बिना सड़क पर उतरने के तरीके ने उनकी अपनी ही पार्टी समेत सहयोगियों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है।

जंतर मंतर की आड़ में प्रदर्शन की राजनीति पर लगा ताला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अब एक ऐसा स्थायी समाधान निकाल लिया है, जिसके बाद संसद और आसपास के संवेदनशील इलाकों में किसी भी तरह के हंगामे या बवाल की गुंजाइश खत्म हो गई है। हाल के दिनों में विपक्षी दलों ने जिस तरह से जंतर मंतर को अपना राजनीतिक अखाड़ा बनाने का प्रयास किया था, उस पर अब आधिकारिक रूप से रोक लगा दी गई है। गृह मंत्रालय की ओर से लिए गए इस फैसले ने उन लोगों को करारा झटका दिया है, जो अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए राजधानी की सड़कों को बाधित करने में विश्वास रखते थे। अब जंतर मंतर पर किसी भी तरह के विरोध-प्रदर्शन या धरना-प्रदर्शन की अनुमति नहीं होगी, जिससे प्रदर्शन की राजनीति करने वाले दलों की दुकान हमेशा के लिए बंद होती नजर आ रही है।

राहुल गांधी का ब्लंडर और इंडी गठबंधन की विफलता

पिछले एक सप्ताह से इलेक्शन कमीशन को लेकर जो राजनीतिक माहौल तैयार करने की कोशिश की गई, उसमें विपक्षी दलों को आम जनता का साथ नहीं मिल पाया है। राहुल गांधी ने पिछले कुछ दिनों में कई बार सड़क पर उतरकर विरोध जताने की कोशिश की, लेकिन हर बार परिणाम निराशाजनक रहे। उनके साथ जुड़ी तथाकथित कॉकरोच पार्टी के नेताओं ने भी काफी जद्दोजहद की, लेकिन देश की जनता ने इन आंदोलनों से खुद को पूरी तरह अलग रखा। स्थिति यह हो गई है कि विपक्ष का हर दांव उल्टा पड़ रहा है और वे अपने ही बिछाए हुए जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। राहुल गांधी ने जिस तरह का रुख अपनाया, उससे उन्होंने खुद को तो कमजोर किया ही, साथ ही अपने सहयोगियों को भी गहरे संकट में धकेल दिया है।

सुप्रीम कोर्ट बनाम सड़क की राजनीति

राहुल गांधी की सबसे बड़ी गलती यह रही कि उन्होंने शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट की गरिमा और संवैधानिक प्रक्रिया को अपनी राजनीतिक रोटियों का हिस्सा बनाने का प्रयास किया। उन्होंने जिस तरह से अपनी राजनीति के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश से मिलने का समय मांगा, वह न केवल हैरान करने वाला था, बल्कि संसदीय परंपराओं के विपरीत भी था। जब उन्हें यह अहसास हुआ कि उनके इस कदम से खुद उनके सहयोगी दल भी किनारा करने लगे हैं, तब उन्हें मजबूरी में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। एक ओर वे न्यायपालिका का सहारा लेने की बात करते हैं, तो दूसरी ओर सड़क पर उतरकर बवाल काटना जारी रखते हैं। विरोधाभास यह है कि जब मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और उस पर सुनवाई चल रही है, तो सड़क पर अराजकता फैलाने का कोई औचित्य ही नहीं बचता।

मोदी विरोधियों के लिए चौंकाने वाले नतीजे

पिछले दो से तीन दिन मोदी विरोधियों के लिए अत्यंत चौंकाने वाले रहे हैं। उन्होंने जो पटकथा तैयार की थी कि जंतर मंतर पर भारी भीड़ जुटाकर पूरे देश को अपने पक्ष में खड़ा कर लेंगे, वह पूरी तरह से फ्लॉप साबित हुई। जनता ने उनके इस तमाशे को नकार दिया है। लोग अब यह समझ चुके हैं कि यह उन हताश राजनीतिक दलों का इकोसिस्टम है, जो चुनाव के मैदान में नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए अब सड़कों पर हिंसा और शोर-शराबे के जरिए उन्हें सत्ता से बेदखल करना चाहते हैं। कॉकरोच पार्टी की सक्रियता ने लोगों के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या उनका एकमात्र एजेंडा सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध है, जबकि शिक्षा और अन्य जनहित के मुद्दों पर वे पूरी तरह मौन हैं।

प्रदर्शन स्थलों का पुनर्गठन और नई व्यवस्था

गृह मंत्रालय द्वारा गठित की गई एक उच्च-स्तरीय कमेटी की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के लिए अब पूरी तरह से नियम बदल दिए गए हैं। जंतर मंतर को आधिकारिक तौर पर 'प्रोटेस्ट साइट' यानी प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर कर दिया गया है (डिनोटिफाई कर दिया गया है)। अब भविष्य में दिल्ली में धरना देने के इच्छुक संगठनों के लिए सरकार ने केवल तीन निर्धारित स्थान तय किए हैं। ये स्थान हैं:

  • रामलीला मैदान
  • बुराडी मैदान
  • CBD ग्राउंड

यह फैसला उन प्रदर्शनकारियों के लिए बहुत बड़ा झटका है जो अक्सर रील बनाने या मीडिया कवरेज पाने के लिए जंतर मंतर का इस्तेमाल करते थे। मंत्रालय का यह कदम उस अराजक संस्कृति को खत्म करने के लिए है, जो आए दिन लुटियंस दिल्ली के आसपास के इलाकों में यातायात को बाधित करती थी। अब अगर किसी को अपनी बात रखनी है, तो उन्हें निर्धारित स्थलों पर ही जाना होगा।

अंत में: क्या खत्म हो गई विपक्ष की रणनीति?

कुल मिलाकर राहुल गांधी और उनकी कॉकरोच पार्टी के लिए यह स्थिति किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं है। जंतर मंतर पर प्रदर्शन की परमिशन लेने के लिए दिल्ली पुलिस के दफ्तर के चक्कर काट रहे नेताओं को अब खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। गृह मंत्रालय की यह सख्ती यह संदेश देती है कि कानून और व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करके कोई भी अपनी राजनीति चमकाने में सफल नहीं होगा। राहुल गांधी का सुप्रीम कोर्ट जाना और फिर बाहर आकर सड़क पर प्रदर्शन का आह्वान करना, इस बात को साबित करता है कि विपक्ष के पास फिलहाल कोई ठोस एजेंडा नहीं बचा है। अब देश की जनता यह देख रही है कि कैसे एक के बाद एक विफलताओं के बाद मोदी विरोधियों का हर 'ब्लंडर' खुद उन्हीं के लिए घातक साबित हो रहा है।

https://hindi.news18.com/news/nation/rahul-gandhi-blunder-and-massive-setback-for-cjp-jantar-mantar-part-2-protest-against-modi-failed-sushant-sinha-desh-ki-pathshala-10905005.html