सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर का सच
अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति और तालिबान के सुरक्षा बलों की गतिविधियों को लेकर अक्सर खबरें और तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं। इसी क्रम में, हाल ही में एक राइफल की तस्वीर ने खूब सुर्खियां बटोरीं। इस तस्वीर में तालिबान के लड़ाकों के हाथ में एक ऐसी राइफल दिखाई दी, जिसे कई लोग भारतीय निर्मित INSAS 1B1 राइफल बताने लगे। राइफल के काले रंग की बनावट और उसमें लगी पारदर्शी मैगजीन को देखकर दावा किया गया कि यह हथियार भारत में बना है। लेकिन इस दावे की हकीकत कुछ और ही है।
मेजर अमित बंसल का स्पष्टीकरण
इस पूरे मामले पर वेटरन मेजर अमित बंसल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के माध्यम से विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तस्वीर में दिख रही राइफल भारतीय INSAS बिल्कुल नहीं है। मेजर बंसल के अनुसार, यह बेल्जियम की मशहूर FN FNC असॉल्ट राइफल है। उन्होंने अपने पोस्ट में बताया कि तालिबान अक्सर इस राइफल के साथ पारदर्शी मैगजीन का उपयोग करता है। चूंकि भारतीय INSAS राइफल की बनावट और FN FNC की संरचना में काफी समानताएं हैं, इसलिए सामान्य लोगों के लिए इन्हें पहली नजर में पहचानना भ्रम पैदा कर सकता है।
INSAS और FN FNC में तकनीकी अंतर
हथियारों के जानकारों का कहना है कि किसी भी राइफल की पहचान केवल उसकी मैगजीन या बाहरी रंग-रूप के आधार पर नहीं की जा सकती। दोनों राइफलों के बीच का अंतर समझना जरूरी है:
- INSAS (इंडियन स्मॉल आर्म्स सिस्टम): इसे भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट (ARDE) द्वारा विकसित किया गया था। इसका निर्माण भारतीय आयुध कारखानों में हुआ। यह राइफल विशेष रूप से भारतीय सेना और सुरक्षा बलों की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी।
- FN FNC: यह बेल्जियम की प्रसिद्ध हथियार निर्माता कंपनी FN Herstal द्वारा डिजाइन की गई असॉल्ट राइफल है। इसे 1970 के दशक में विकसित किया गया और 1979 के आसपास इसे सेवा में शामिल किया गया था।
दोनों ही राइफलें 5.56×45 मिमी के कारतूस का उपयोग करती हैं, जो एक बड़ा कारण है कि इनके बाहरी डिजाइन में कई तकनीकी समानताएं नजर आती हैं। हालांकि, ये दोनों हथियार पूरी तरह से अलग-अलग देशों और अलग-अलग इंजीनियरिंग प्रक्रियाओं का परिणाम हैं।
पारदर्शी मैगजीन ही भ्रम की मुख्य वजह
INSAS राइफल की सबसे विशिष्ट पहचान इसकी पारदर्शी पॉलीमर मैगजीन है, जिससे सैनिक आसानी से देख सकते हैं कि अंदर कितनी गोलियां बची हैं। यही एक विशेषता तालिबान के पास मौजूद FN FNC राइफल में भी देखी गई, जिससे लोग भ्रमित हो गए। हालांकि, FN FNC के मानक मॉडल में सामान्यतः अपारदर्शी मैगजीन का इस्तेमाल होता है, लेकिन युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अक्सर हथियारों के हिस्सों को आपस में बदला जाता है या अलग-अलग प्रकार की एक्सेसरीज का प्रयोग किया जाता है। केवल एक मैगजीन को देखकर किसी हथियार को किसी देश का उत्पाद घोषित कर देना तकनीकी रूप से सही नहीं है।
दोनों राइफलों के बीच समानताएं और संरचना
INSAS और FN FNC के बीच कई समानताएं हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता:
- दोनों ही राइफलें गैस से चलने वाले फायरिंग सिस्टम पर आधारित हैं।
- दोनों का कैलिबर समान है, जो 5.56×45 मिमी है।
- दोनों राइफलों के अगले हिस्से और बैरल की बनावट में काफी हद तक समानता दिखाई देती है, जो एक औसत दर्शक को कंफ्यूज करने के लिए पर्याप्त है।
इसके बावजूद, दोनों का फायरिंग मोड और इंटरनल मैकेनिज्म काफी अलग है। FN FNC में एक गोली, तीन गोलियों का बर्स्ट और ऑटोमैटिक फायरिंग जैसे विकल्प मिलते हैं। INSAS भी अपने विशिष्ट संस्करणों में तीन गोलियों के बर्स्ट का विकल्प प्रदान करती है, जो इसकी समानता को और गहरा कर देता है।
अफगानिस्तान में FN FNC कैसे पहुंची?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह हथियार बेल्जियम निर्मित FN FNC है, तो यह तालिबान के हाथों में कैसे आई? इस पर अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। अफगानिस्तान का इतिहास युद्धों से भरा रहा है, जहाँ दशकों से दुनिया भर के हथियार विभिन्न माध्यमों से पहुंचते रहे हैं। यह कहना कि यह हथियार किसी विशेष देश के माध्यम से तालिबान को मिले हैं, बिना किसी पुख्ता सबूत के गलत होगा। भारत सरकार के पास अपनी INSAS राइफलों के वितरण का पूरा ब्योरा है, और इस तस्वीर को भारत द्वारा तालिबान को हथियार देने के सबूत के रूप में पेश करना पूरी तरह निराधार है।
निष्कर्ष
मेजर अमित बंसल की स्पष्टीकरण के बाद यह साफ हो गया है कि सोशल मीडिया पर चल रहा दावा गलत है। तालिबान के पास मौजूद राइफल FN FNC है, न कि भारत की INSAS। हथियारों के मामले में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनकी तकनीकी विशेषताओं और आधिकारिक स्रोतों की जांच करना अनिवार्य है। इस तरह की भ्रामक तस्वीरें अक्सर प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, इसलिए इनकी वास्तविकता को समझना बेहद जरूरी है।
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