समुद्री सुरक्षा में नई मजबूती
भारतीय नौसेना की मारक क्षमता में एक बड़ा विस्तार हुआ है। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम में 'मंगरोल' युद्धपोत को नौसेना में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया है। यह अत्याधुनिक युद्धपोत उथले समुद्री इलाकों में पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे निपटने की विशेष तकनीकी क्षमता रखता है। तटीय क्षेत्रों में भारत की सुरक्षा व्यवस्था को अभेद्य बनाने के लिए इसे खास तौर पर तैयार किया गया है। इस शानदार जहाज का निर्माण कोच्चि के कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा किया गया है।
पनडुब्बी रोधी युद्ध में विशेषज्ञ
'मंगरोल' असल में एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वॉटर क्राफ्ट यानी ASW-SWC श्रेणी का तीसरा ऐसा जहाज है जिसे नौसेना ने अपने बेड़े का हिस्सा बनाया है। इसकी बनावट ऐसी है कि यह कम गहरे पानी के भीतर छिपे खतरों को आसानी से पहचान सकता है। यह जहाज अकेले नहीं, बल्कि समुद्री गश्ती विमानों, हेलीकॉप्टर और नौसेना के अन्य बड़े युद्धपोतों के साथ मिलकर एक मजबूत जाल बनाता है। तटीय इलाकों में जहां बड़े युद्धपोत गहराई कम होने के कारण पूरी तरह से संचालन नहीं कर पाते, वहां 'मंगरोल' अपनी फुर्ती से प्रभावी भूमिका निभाता है। यह जहाज तीन डीजल इंजन और वॉटरजेट प्रणाली से चलता है, जो इसे कम पानी में भी तेजी से दिशा बदलने में सक्षम बनाती है। इसके अलावा, यह निगरानी रखने, छोटे समुद्री अभियानों को अंजाम देने और बारूदी सुरंगों को बेअसर करने में भी पूरी तरह सक्षम है।
घातक हथियारों और सेंसर से लैस
दुश्मन के किसी भी दुस्साहस को रोकने के लिए इस युद्धपोत में विश्वस्तरीय हथियार और सेंसर सिस्टम लगाए गए हैं। पानी के भीतर दुश्मन की हर आहट को सुनने के लिए इसमें 'अभय' हल-माउंटेड सोनार दिया गया है। रक्षात्मक और आक्रामक प्रणालियों में इसमें हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी पनडुब्बी रोधी रॉकेट लॉन्चर और 'मारीच' उन्नत टॉरपीडो डिकॉय सिस्टम शामिल हैं। ये सिस्टम दुश्मन के टॉरपीडो हमले से जहाज को बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। जिस तरह से समुद्री सुरक्षा का माहौल तेजी से बदल रहा है, ऐसे में 'मंगरोल' का शामिल होना नौसेना के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इस कार्यक्रम में पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, वाइस एडमिरल संजय वत्सायन मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
गौरवशाली विरासत और नाम का महत्व
इस युद्धपोत का नाम गुजरात के जूनागढ़ जिले में स्थित ऐतिहासिक तटीय शहर और प्रमुख मछली पकड़ने वाले बंदरगाह मंगरोल के नाम पर रखा गया है। यह परंपरा नौसेना की पुरानी संस्कृति से जुड़ी है, जिसमें पुराने युद्धपोतों की विरासत को नए जहाजों के नाम के साथ जीवित रखा जाता है। यह नया 'मंगरोल' वास्तव में पूर्ववर्ती आईएनएस मंगरोल (एम85) की यादों को संजोए हुए है, जो एक बारूदी सुरंग-रोधी पोत था और जिसने अप्रैल 2004 तक नौसेना को अपनी सेवाएं दी थीं।
मेक इन इंडिया का दम
नौसेना की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, 'मंगरोल' में 80 प्रतिशत से ज्यादा स्वदेशी सामग्री और तकनीक का उपयोग किया गया है। यह उपलब्धि भारत के स्वदेशी जहाज निर्माण के कौशल, अत्याधुनिक डिजाइन और उन्नत हथियारों के एकीकरण की क्षमता को वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करती है। आने वाले समय में यह युद्धपोत तटीय सुरक्षा के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण स्तंभ साबित होगा।
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