हिमाचल प्रदेश को मिली पहली बागवानी मोनो रेल, मंडी के सुंदरनगर में किसानों की राह होगी आसान

मंडी जिले के सुंदरनगर में पहाड़ी इलाकों में बागवानी उत्पादों को ढोने के लिए प्रदेश की पहली मोनो रेल का ट्रायल शुरू हो गया है। आईआईटी मंडी की तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर तैयार इस अनूठी परियोजना से किसानों और बागवानों को बड़ी राहत मिलेगी।

हिमाचल में बागवानी का नया युग

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में अब खेती और बागवानी को आसान बनाने के लिए एक नई और अनोखी पहल शुरू की गई है। मंडी जिले के सुंदरनगर में बागवानों के लिए राज्य की पहली मोनो रेल परियोजना पर काम अंतिम चरण में है। दुर्गम और ढलानदार रास्तों पर फल और कृषि उत्पादों को मुख्य सड़क तक पहुँचाना बागवानों के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। अब इस आधुनिक तकनीक के जरिए उस समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है।

पलौहटा गांव में पायलट प्रोजेक्ट

इस अभिनव परियोजना का पायलट प्रोजेक्ट सुंदरनगर के पलौहटा गांव में लगाया जा रहा है। पलौहटा-2 क्लस्टर फल उत्पादक एवं विपणन संघ के अध्यक्ष मुनीश शर्मा के अनुसार, यह राज्य का अपनी तरह का पहला प्रोजेक्ट है। उन्होंने बताया कि उनका क्लस्टर कुल 21.5 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। शुरुआत में इस परियोजना को 1 किमी के दायरे में लागू करने की योजना है, जिसमें से करीब 300 मीटर ट्रैक का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। हाल ही में इसका सफल ट्रायल भी किया गया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य सरकार इस पायलट प्रोजेक्ट की सफलता को देखते हुए इसे पूरे क्लस्टर में विस्तार देने की अनुमति जल्द देगी।

बागवानी मंत्री की विशेष रुचि

इस पूरे प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने में हिमाचल प्रदेश के बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने विशेष रुचि दिखाई है। विभागीय सहयोग और नीतिगत प्रोत्साहन के कारण ही यह कार्य इतनी तेजी से आगे बढ़ पाया है। परियोजना से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि यह प्रयोग सफल रहता है, तो हिमाचल के अन्य बागवानी क्लस्टरों में भी इस तरह की मोनो रेल स्थापित की जा सकेगी।

कैसे काम करेगा यह सिस्टम

पहाड़ों पर सड़क निर्माण हर खेत तक पहुंचना नामुमकिन सा होता है। ऐसे में यह मोनो रेल खाद, बीज और तैयार फसल को ढोने का सबसे कारगर विकल्प बनकर उभरी है। क्षेत्र के बागवान संजय सकलानी का कहना है कि उनके गांव में बागवानी विभाग का क्लस्टर तो था, लेकिन सड़क सुविधा न होने से उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। फसल पकने के बाद उसे बाजार तक ले जाने की समस्या ने इस मोनो रेल के विचार को जन्म दिया। वहीं, एक अन्य बागवान देवी सिंह के अनुसार, यह तकनीक पहाड़ी इलाकों के लिए वरदान साबित हो सकती है, क्योंकि हर खेत तक सड़क पहुंचाना न केवल खर्चीला है, बल्कि भौगोलिक रूप से कठिन भी है।

आईआईटी मंडी की तकनीकी भूमिका

इस परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता यानी टेक्निकल फिजिबिलिटी रिपोर्ट को तैयार करने में आईआईटी मंडी की बड़ी भूमिका रही है। संस्थान के मैकेनिकल और सिविल इंजीनियरिंग विभाग की विशेषज्ञ टीम ने इसका पूरा खाका तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट को धरातल पर क्रियान्वित करने वाले डिस्ट्रीब्यूटर तेजेंद्र सैनी का कहना है कि यह उनके लिए भी एक अनूठा अनुभव रहा है। उन्होंने बताया कि इस मोनो रेल के लिए आवश्यक सामान को अलग-अलग स्थानों से जुटाकर इस प्रोजेक्ट को पूरा किया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह की तकनीक का उपयोग विदेशों में काफी समय से बागवानी के लिए किया जा रहा है और अब हिमाचल के बागवान भी इसी तकनीक के जरिए अपनी आय और उत्पादकता में सुधार कर सकेंगे।

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