चुनाव आयोग के समर्थन में लामबंद हुए 124 पूर्व अधिकारी, धांधली के बेबुनियाद आरोपों पर जताई चिंता

देश के 124 पूर्व आईएएस, आईएफएस और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने एक साझा पत्र लिखकर चुनाव आयोग का मजबूती से बचाव किया है। उन्होंने जोर दिया कि चुनाव में गड़बड़ी के आरोप बिना ठोस सबूतों के लगाना न केवल गलत है, बल्कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में आम जनता का भरोसा भी डगमगाता है।

पूर्व अफसरों का खुला समर्थन

हाल के दिनों में चुनावी पारदर्शिता और निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों के बीच 124 पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा और अन्य वरिष्ठ सिविल सेवा अधिकारियों ने एक साझा पत्र जारी कर भारतीय निर्वाचन आयोग यानी ECI के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की है। इन पूर्व अफसरों का स्पष्ट मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की धांधली या गड़बड़ी का दावा केवल ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इससे पहले भी 42 पूर्व न्यायाधीशों ने इसी तरह का पत्र लिखकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली का समर्थन किया था।

चुनावी सुधारों की बदलती तस्वीर

नई दिल्ली से जारी इस पत्र में पूर्व अधिकारियों ने रेखांकित किया है कि भारत की चुनावी व्यवस्था ने पिछले कुछ दशकों में एक लंबा सफर तय किया है। एक समय था जब बूथ कैप्चरिंग, मतपेटियों में फर्जी वोट डालना और हिंसा जैसी घटनाएं आम हुआ करती थीं। आज की स्थिति बिल्कुल अलग है। अधिकारियों ने कहा कि मतदान केंद्रों पर उम्मीदवारों के एजेंटों की सक्रिय उपस्थिति, EVM की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्ट्रॉन्ग रूम की कड़ी निगरानी, और VVPAT पर्चियों के माध्यम से मतों का सत्यापन ऐसी व्यवस्थाएं हैं जिन्होंने चुनाव को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बना दिया है।

बिहार चुनाव और संस्थागत मजबूती

पूर्व नौकरशाहों ने अपने पत्र में 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने तर्क दिया कि इस चुनाव के दौरान प्रबंधन इतना प्रभावी था कि किसी भी मतदान केंद्र पर दोबारा मतदान कराने की नौबत नहीं आई। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1951 के बाद इस चुनाव में अब तक का सबसे अधिक मतदान प्रतिशत दर्ज किया गया। अधिकारियों के मुताबिक, यह उपलब्धि चुनाव आयोग के बेहतर प्रबंधन और संस्थागत सुरक्षा उपायों की सफलता को दर्शाती है। उनका कहना है कि चुनावी प्रक्रिया का मूल्यांकन राजनीतिक बयानबाजी के बजाय जमीनी तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए।

जीत और हार पर बदलता दृष्टिकोण

पत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़वी सच्चाई को रेखांकित किया गया है। अधिकारियों ने लिखा है कि कोई भी चुनावी तंत्र ऐसा नहीं हो सकता जो केवल एक पक्ष की जीत पर उसे ईमानदार बताए और उसी तंत्र को हारने की स्थिति में धांधलीपूर्ण करार दे। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र में सत्तासीन दल भी इसी चुनाव आयोग के तत्वावधान में आयोजित कई विधानसभा चुनावों में हार का सामना कर चुका है। इसी तरह, 2024 के लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ पार्टी उस चुनाव में स्वयं अपने दम पर पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर सकी थी। इन तथ्यों को देखते हुए उन्होंने कहा कि धांधली के आरोप लगाने से पहले आत्मनिरीक्षण करना आवश्यक है।

मतदाता सूची का गहन पुनरीक्षण क्यों जरूरी है

पत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को एक अत्यंत अनिवार्य प्रक्रिया बताया गया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह से त्रुटिहीन और अपडेट रखना है। इस कवायद के दौरान मृत मतदाताओं के नामों को हटाना, दोहरी प्रविष्टियों को खत्म करना और दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके मतदाताओं का पता लगाकर सूची को शुद्ध करना शामिल है। पूर्व अधिकारियों ने चेतावनी दी कि यदि मतदाता सूची में विसंगतियां बनी रहती हैं, तो फर्जी पहचान का उपयोग कर गलत तरीके से वोट डालने का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे पूरी चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं।

बिहार में मिले चौकाने वाले आंकड़े

अधिकारियों ने पत्र में बिहार के आंकड़ों को साझा करते हुए बताया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में अनियमितताएं पकड़ी गई हैं। इसके तहत लगभग 22 लाख मृत मतदाताओं की पहचान की गई, जबकि 7 लाख से अधिक दोहरी प्रविष्टियां यानी डुप्लीकेट नाम पाए गए। साथ ही, लगभग 21.5 लाख नए पात्र मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल किए गए। इन आंकड़ों ने यह साबित किया कि सूची का नियमित सुधार कितना आवश्यक है। उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि सुधार प्रक्रिया के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे, इसके लिए कड़े सुरक्षा प्रावधान भी मौजूद हैं।

कानूनी सुरक्षा और प्रक्रिया का पालन

पूर्व अधिकारियों का कहना है कि नाम हटाए जाने की संभावित त्रुटियों को सुधारने के लिए आयोग की ओर से पूरी व्यवस्था उपलब्ध है। इसमें मसौदा सूची का प्रकाशन, दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर, सुनवाई की सुविधा और अपील करने का कानूनी अधिकार शामिल है। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन इन सवालों का समाधान केवल स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से ही किया जाना चाहिए।

आरोप साबित करने की जिम्मेदारी

पत्र के एक हिस्से में साफ तौर पर लिखा है कि आरोप लगाना आसान है लेकिन उसे प्रमाणित करना आरोप लगाने वाले की जिम्मेदारी है। अधिकारियों ने कहा कि बिना किसी साक्ष्य के सार्वजनिक मंचों पर चुनावी धांधली का शोर मचाना लोकतंत्र के लिए घातक हो सकता है। यदि किसी को चुनाव के नतीजों या प्रक्रिया पर संदेह है, तो वे कानूनी मार्ग अपनाकर उच्च न्यायालय में अपनी याचिका दाखिल कर सकते हैं। बिना आधार के की गई आलोचनाएं लोकतांत्रिक संस्थानों के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करती हैं।

आम नागरिकों से अपील

अंत में, इन पूर्व सिविल सेवकों ने देश के प्रत्येक नागरिक से अपील की है कि वे मतदाता सूची में अपने और अपने परिवार के नामों की स्वयं जांच करें। उन्होंने प्रवासी मजदूरों और पड़ोसियों को भी जागरूक करने की बात कही ताकि एक सटीक मतदाता सूची तैयार की जा सके। साथ ही, उन्होंने बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO के कठिन परिश्रम की भी सराहना की, जो मतदाता सूची को अपडेट रखने में दिन-रात कार्य करते हैं। 124 अधिकारियों ने निष्कर्ष में कहा कि चुनावी संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखना हर नागरिक और राजनीतिक दल का सामूहिक उत्तरदायित्व है।

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