बिहार के रोहतास और शाहाबाद क्षेत्रों में पारंपरिक फसलों के साथ-साथ अब किसान आधुनिक कृषि वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना रहे हैं। इस क्षेत्र में पारंपरिक रूप से उगाई जाने वाली नाटी मंसूरी धान की तुलना में अब एक विशेष किस्म का धान किसानों की किस्मत बदलने की तैयारी में है। इस धान का नाम है सोनाचूर। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, सोनाचूर धान की पैदावार भले ही नाटी मंसूरी से कम हो, लेकिन बाजार में इसके ऊंचे दाम और विशिष्ट सुगंध के कारण यह किसानों की जेबें भरने में अधिक सक्षम है।
धान अनुसंधान केंद्र, रोहतास के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि किस प्रकार केवल पैदावार की मात्रा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय फसल की गुणवत्ता और बाजार की मांग को समझकर खेती करने से किसान अपनी आय में भारी वृद्धि कर सकते हैं। सोनाचूर धान इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर उभरा है, जो कम लागत और कम पैदावार के बावजूद बंपर मुनाफा सुनिश्चित कर रहा है।
पैदावार और चावल का गणित: नाटी मंसूरी बनाम सोनाचूर
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह के अनुसार, शाहाबाद और रोहतास क्षेत्र के खेतों में जब किसान नाटी मंसूरी धान उगाते हैं, तो उन्हें प्रति हेक्टेयर औसतन 70 से 75 क्विंटल तक धान की उपज प्राप्त होती है। इस धान की कुटाई कराने के बाद लगभग 55 से 60 क्विंटल चावल प्राप्त होता है। उत्पादन के आंकड़ों को देखें तो यह काफी बेहतर और आकर्षक प्रतीत होता है।
इसके विपरीत, यदि उसी एक हेक्टेयर भूमि पर सोनाचूर धान की खेती की जाती है, तो इसकी पैदावार नाटी मंसूरी की तुलना में काफी कम होती है। प्रति हेक्टेयर खेत से अमूमन 32 से 35 क्विंटल सोनाचूर धान ही प्राप्त हो पाता है। इस धान की कुटाई से मिलने वाले चावल की मात्रा भी मात्र 25 क्विंटल के आसपास रहती है। यदि केवल मात्रा को आधार माना जाए तो नाटी मंसूरी भारी पड़ती दिखती है, लेकिन असली खेल बाजार में मिलने वाली कीमतों से तय होता है।
बाजार भाव का अंतर: ₹85 हजार का सीधा फायदा
वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने दोनों ही प्रकार के चावलों के बाजार भाव की तुलना करते हुए एक बेहद रोचक वित्तीय गणित प्रस्तुत किया है। उन्होंने बताया कि सोनाचूर चावल अपनी खास खुशबू और स्वाद के लिए जाना जाता है, जिसके कारण बाजार में इसका भाव कभी भी 100 रुपये प्रति किलोग्राम से कम नहीं होता है। इस हिसाब से देखें तो एक हेक्टेयर में उत्पादित होने वाले 25 क्विंटल सोनाचूर चावल को बेचकर किसान आसानी से करीब 2.50 लाख रुपये की कमाई कर सकते हैं।
वहीं दूसरी ओर, अधिक पैदावार देने वाले नाटी मंसूरी चावल का सामान्य बाजार भाव मात्र 28 से 30 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास रहता है। यदि हम नाटी मंसूरी की प्रति हेक्टेयर अधिकतम उपज यानी 55 क्विंटल चावल को 30 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचते हैं, तो कुल आय लगभग 1.65 लाख रुपये बनती है।
इस प्रकार, गणित पूरी तरह साफ हो जाता है। कम पैदावार होने के बावजूद सोनाचूर धान उगाने वाले किसान, नाटी मंसूरी उगाने वाले किसानों की तुलना में प्रति हेक्टेयर सीधे तौर पर 85 हजार रुपये का अतिरिक्त मुनाफा कमा सकते हैं।
कम लागत और जैविक खेती से बढ़ेगी बचत
सोनाचूर धान की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसकी खेती में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग काफी सीमित किया जा सकता है। डॉ. सिंह का सुझाव है कि किसान अपने खेतों की मिट्टी की जांच कराकर, उसकी आवश्यकता के अनुसार ही पोषक तत्वों का प्रबंधन करें। यदि किसान प्राकृतिक अथवा जैविक तरीकों से सोनाचूर की खेती करते हैं, तो उनकी लागत में और भी अधिक गिरावट आएगी।
जैविक तरीके से उगाए गए सोनाचूर चावल की मांग शहरी बाजारों में और भी अधिक होती है, जिससे किसानों को इसके लिए और भी बेहतर दाम मिल सकते हैं। गुणवत्तापूर्ण और जैविक उत्पादन से किसानों की केवल उत्पादन लागत ही कम नहीं होगी, बल्कि पर्यावरण और भूमि की सेहत भी सुधरेगी।
जीआई (GI) टैग की तैयारी: मिलने वाली है वैश्विक पहचान
शाहाबाद क्षेत्र के इस विशेष सुगंधित सोनाचूर धान को एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने का रास्ता भी अब साफ होता दिख रहा है। वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने बताया कि रोहतास और शाहाबाद क्षेत्र की इस अनूठी पहचान को सहेजने और बढ़ावा देने के लिए इसे भौगोलिक संकेतक यानी जीआई (GI) टैग दिलाने की कवायद तेजी से चल रही है।
स्थानीय किसानों के सहयोग और कृषि विभाग के प्रयासों से आवश्यक सभी दस्तावेज और वैज्ञानिक प्रमाण संबंधित जीआई (GI) पंजीकरण प्राधिकरण को भेजे जा चुके हैं। वर्तमान में यह प्रक्रिया अपने बिल्कुल अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले एक महीने के भीतर सोनाचूर धान को आधिकारिक रूप से जीआई (GI) टैग मिल जाएगा।
एक बार जीआई (GI) टैग मिल जाने के बाद, रोहतास और शाहाबाद के सोनाचूर धान की शुद्धता और प्रामाणिकता की पुष्टि हो जाएगी। इससे न केवल स्थानीय बाजारों में बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक बाजारों में भी इस चावल की मांग में भारी उछाल आएगा, जिसका सीधा और सबसे बड़ा आर्थिक लाभ इस क्षेत्र के किसानों को मिलेगा। पारंपरिक खेती को आधुनिक बाजार से जोड़ने का यह एक सुनहरा अवसर साबित हो सकता है।
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