यूपीआई शुल्क पर आज मचेगा सस्पेंस खत्म
भारत में डिजिटल भुगतान का सबसे बड़ा जरिया बन चुके यूपीआई को लेकर इन दिनों एक बड़ी चिंता बनी हुई है। देश के करोड़ों यूजर और व्यापारी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि क्या 15 अक्टूबर से यूपीआई के माध्यम से किए जाने वाले ट्रांजेक्शन पर शुल्क देना होगा। इस सवाल का जवाब अब बस कुछ ही घंटों में मिल सकता है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी NPCI ने आज 9 अक्टूबर को एक अहम बैठक बुलाई है, जिसमें यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू करने के फैसले पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
क्यों टल सकता है एमडीआर का फैसला
मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, इस बैठक में एमडीआर को लागू करने की तारीख को आगे बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि एनपीसीआई इस विवादित फैसले को जनवरी 2027 तक टालने का आधिकारिक ऐलान कर सकता है। दरअसल, जब से एनपीसीआई ने 2,000 रुपये से ज्यादा के यूपीआई पेमेंट पर 0.4 फीसदी एमडीआर लगाने की घोषणा की है, तब से ही देशभर में इसका कड़ा विरोध हो रहा है। आम लोगों के साथ-साथ छोटे और बड़े व्यापारियों ने भी इस कदम को डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता के लिए घातक बताया है।
विरोध का असर और त्योहारी सीजन की दलीलें
यूपीआई पर शुल्क लगाने का प्रस्ताव आते ही सोशल मीडिया और विभिन्न व्यापारिक मंचों पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। दुकानदारों का तर्क है कि इससे यूपीआई से भुगतान स्वीकार करने में उनकी दिलचस्पी कम हो जाएगी और ग्राहकों पर भी बोझ पड़ेगा। सूत्रों का कहना है कि फिनटेक कंपनियों और पेमेंट एग्रीगेटर्स ने भी एनपीसीआई से गुहार लगाई है कि इस फैसले को लागू करने का समय सही नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में देश में त्योहारी सीजन की शुरुआत हो चुकी है। ऐसे में किसी भी प्रकार का नया शुल्क ग्राहकों के उत्साह को ठंडा कर सकता है। फिनटेक कंपनियों और व्यापारिक संगठनों ने इसी तथ्य को आधार बनाकर मांग की है कि उपभोक्ता सेंटिमेंट को प्रभावित होने से बचाने के लिए कम से कम कुछ समय के लिए इस शुल्क को टाल दिया जाए। इसी दबाव के चलते एनपीसीआई की यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी आज इस विषय पर मंथन करेगी।
क्या है एमडीआर का पूरा गणित
एनपीसीआई द्वारा प्रस्तावित नियम के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के हर ट्रांजेक्शन पर 0.4 फीसदी का शुल्क वसूला जाना है। इसके गणित को इस तरह समझा जा सकता है:
- यदि कोई ग्राहक 2,000 रुपये का भुगतान करता है, तो उस पर 8 रुपये का एमडीआर लगेगा।
- यदि ट्रांजेक्शन की राशि 10,000 रुपये है, तो व्यापारी या संबंधित पक्ष को 40 रुपये का शुल्क देना होगा।
यह शुल्क संरचना 15 अक्टूबर से प्रभावी होनी है, लेकिन अब इसे जनवरी 2027 तक टालने की संभावना ने व्यापारियों और उपभोक्ताओं को राहत की उम्मीद दी है।
कार्ड से ज्यादा यूपीआई की अहमियत
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में यूपीआई की भूमिका कार्ड से कहीं ज्यादा बड़ी और सरल हो चुकी है। देश में क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के मुकाबले यूपीआई का दायरा बहुत विस्तृत है। एक बड़ा कारण यह है कि आरबीआई ने क्रेडिट कार्ड से लोन या ईएमआई भुगतान की प्रक्रिया को लेकर कुछ सीमाएं रखी हैं, जबकि यूपीआई के जरिए लोन ईएमआई और अन्य बिलों का भुगतान बेहद सहज है। यही कारण है कि आज भारत का हर छोटा-बड़ा दुकानदार भुगतान के लिए यूपीआई पर निर्भर है। एनपीसीआई के इस फैसले पर सबकी नजरें इसलिए टिकी हैं क्योंकि यूपीआई भारत की डिजिटल सफलता की रीढ़ माना जाता है और इसे महंगा करना अर्थव्यवस्था की गति पर असर डाल सकता है। अब आज दोपहर 1 से 2 बजे के बीच होने वाली बैठक के बाद यह स्थिति पूरी तरह साफ हो जाएगी कि आम जनता को राहत मिलेगी या फिर 15 अक्टूबर से डिजिटल भुगतान जेब पर भारी पड़ेगा।
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