भारतीय सिनेमा के इतिहास में नाना पाटेकर एक ऐसा नाम हैं, जिनकी संवाद अदायगी, अनोखे अंदाज और दमदार अभिनय ने दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी है। उन्होंने अपने शानदार करियर में एक से बढ़कर एक यादगार किरदार निभाए। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी सिनेमा जगत को यह अनमोल सितारा देने के पीछे उनकी बेहद करीबी सहेली और हिंदी सिनेमा की महान अभिनेत्री स्मिता पाटिल का हाथ था। अगर स्मिता पाटिल ने नाना पाटेकर के साथ जबरदस्ती नहीं की होती और उन्हें फिल्मों में आने के लिए मजबूर न किया होता, तो शायद दर्शकों को कभी 'परिंदा' का अन्ना या 'वेलकम' का उदय शेट्टी देखने को नहीं मिलता। नाना पाटेकर ने खुद एक पुराने साक्षात्कार के दौरान इस बात का बहुत ही भावुक खुलासा किया था।
रंगमंच की दुनिया में ही बेहद खुश थे नाना पाटेकर
नाना पाटेकर का अभिनय के प्रति लगाव बचपन से ही था, लेकिन उनकी आत्मा हमेशा से थिएटर यानी रंगमंच में बसती थी। वे स्टेज पर अभिनय करके बेहद संतुष्ट और खुश थे। फिल्मों की चकाचौंध उन्हें कभी आकर्षित नहीं करती थी और न ही बड़े पर्दे पर आने की उनकी कोई व्यक्तिगत इच्छा थी। वे मानते थे कि थिएटर ही वह एकमात्र माध्यम है, जहां एक कलाकार अपनी कला को पूरी शिद्दत और स्वतंत्रता के साथ प्रस्तुत कर सकता है। यही कारण था कि जब शुरुआत में उन्हें कई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे, तो उन्होंने उनमें कोई खास रुचि नहीं दिखाई। प्रसिद्ध पत्रकार रजत शर्मा के चर्चित शो 'आप की अदालत' में शिरकत करते हुए नाना पाटेकर ने अपने इसी शुरुआती सफर से जुड़े कई अनसुने और दिलचस्प किस्से साझा किए थे। उन्होंने बताया था कि उनके फिल्मी करियर का सारा श्रेय केवल और केवल स्मिता पाटिल को ही जाता है, जो उन्हें लगातार फिल्मों की दुनिया में कदम रखने की सलाह देती रहती थीं।
स्मिता पाटिल ने कैसे बदला नाना का इरादा?
नाना पाटेकर ने इस बात को स्वीकार किया था कि स्मिता पाटिल ने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए एक तरह से मजबूर कर दिया था। नाना रंगमंच पर सक्रिय रहते हुए अपनी ही धुन में मगन थे, लेकिन स्मिता की पारखी नजरों ने नाना के भीतर छिपी उस अद्भुत प्रतिभा को भांप लिया था, जिसे खुद नाना भी नहीं देख पा रहे थे। स्मिता पाटिल का दृढ़ विश्वास था कि नाना की असाधारण अभिनय क्षमता को सिर्फ थिएटर के सीमित दायरे तक ही सिमटकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे पूरी दुनिया के सामने बड़े पर्दे पर आना चाहिए। इसी उद्देश्य के साथ स्मिता ने नाना पाटेकर का नाम प्रसिद्ध फिल्म निर्माता रवि चोपड़ा तक पहुंचाया। इसके बाद ही नाना के लिए फिल्म 'आज की आवाज' में काम करने के रास्ते खुले। नाना पाटेकर ने बेहद आदर के साथ कहा था कि स्मिता ने उनके भीतर के कलाकार को उनसे भी पहले पहचान लिया था और अगर वे बार-बार उन पर फिल्मों में आने का दबाव नहीं बनातीं, तो वे शायद जीवन भर केवल रंगमंच की दुनिया में ही रमे रहते। इसी बातचीत के दौरान उन्होंने फिल्म 'परिंदा' की शूटिंग के समय शरीर जलने वाले बेहद खतरनाक हादसे का वाकया भी साझा किया था।
करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुई स्मिता की सलाह
फिल्म 'आज की आवाज' नाना पाटेकर के शानदार फिल्मी सफर की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीढ़ी साबित हुई। इस फिल्म के बाद नाना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा में अपनी एक बेहद खास और विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली। उनके करियर में कई ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने उन्हें अभिनय का सरताज बना दिया। इनमें शामिल कुछ प्रमुख फिल्में इस प्रकार हैं:
- परिंदा: जिसमें उनके नकारात्मक किरदार ने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए थे।
- क्रांतिवीर: जिसमें उनके जोशीले संवादों ने देश भर के दर्शकों में नया उत्साह भर दिया था।
- अग्निसाक्षी: जिसमें उनके अभिनय की तीव्रता ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया।
- अब तक छप्पन: जिसमें उन्होंने एक बेहद कड़क पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाई।
- वेलकम: जिसमें उनकी बेहतरीन कॉमेडी टाइमिंग ने लोगों को हंसने पर मजबूर कर दिया।
- नटसम्राट: जिसमें उनके अभिनय की गहराई ने दर्शकों की आंखों में आंसू ला दिए।
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि उन्होंने कभी भी खुद को किसी एक खास तरह के ढर्रे या किरदार में बंधने नहीं दिया। उन्होंने संजीदा किरदारों से लेकर क्रूर खलनायक और फिर बेमिसाल कॉमेडी तक, हर तरह की भूमिका को पूरी सहजता के साथ पर्दे पर उतारा। लेकिन इन तमाम सफलताओं की नींव में स्मिता पाटिल का वह दृढ़ विश्वास ही था, जिसे नाना हमेशा याद करते थे।
सिनेमाई पर्दे के दो महान सितारों का सफरनामा
आज ये दोनों ही महान कलाकार हमारे बीच इस भौतिक दुनिया में मौजूद नहीं हैं। बेहद प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल का निधन साल 1986 में मात्र 31 साल की बेहद छोटी उम्र में हो गया था, जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। वहीं दूसरी तरफ, नाना पाटेकर ने भी 8 अक्टूबर को 75 साल की आयु में अपनी अंतिम सांस ली। गोवा में दिल का दौरा पड़ने यानी कार्डियक अरेस्ट के कारण उनका दुखद निधन हुआ था। नाना के चले जाने से भारतीय फिल्म जगत ने एक ऐसे अनमोल रत्न को खो दिया, जिसने लगभग पांच दशकों तक दर्शकों के दिलों पर राज किया और अपने अभिनय से सिनेमा को समृद्ध बनाया। नाना के महाप्रयाण के बाद स्मिता पाटिल और उनके बीच का यह पुराना किस्सा एक बार फिर सोशल मीडिया और सिनेमाई गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। जिस दोस्त ने उन्हें जबरदस्ती सिनेमा की राह दिखाई थी, उसी फैसले ने अंततः भारतीय दर्शकों को एक ऐसा नायाब कलाकार दिया, जिसकी आवाज, संवाद बोलने की शैली और अभिनय की आक्रामकता युगों-युगों तक याद की जाएगी।
स्मिता पाटिल के योगदान को हमेशा याद करते थे नाना
नाना पाटेकर के जीवन में स्मिता पाटिल की जगह सिर्फ एक सह-कलाकार या साधारण सहेली से कहीं बढ़कर थी। वे उनके अभिनय कौशल पर अटूट विश्वास रखने वाली उन चुनिंदा शुभचिंतकों में सबसे आगे थीं, जिन्होंने नाना को बड़े पर्दे की चमक-दमक के बीच स्थापित करने में मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। नाना पाटेकर का यह पुराना संस्मरण हमें सिखाता है कि कभी-कभी किसी कलाकार के जीवन की दिशा बदलने के लिए केवल एक सच्चे मार्गदर्शक और उसके गहरे विश्वास की जरूरत होती है। यदि स्मिता पाटिल ने उस दौर में नाना को रंगमंच से बाहर निकालकर फिल्मों की ओर न धकेला होता, तो शायद हिंदी सिनेमा का इतिहास कुछ और ही होता। दर्शकों को कभी 'परिंदा' का खूंखार अन्ना, 'क्रांतिवीर' का क्रांतिकारी प्रताप या फिर 'वेलकम' का लोकप्रिय उदय भाई देखने को नहीं मिलता। आज भले ही ये दोनों महान आत्माएं हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन दोनों के बीच का यह अटूट विश्वास और उनके अभिनय की अमर यादें हमेशा फिल्मों के जरिए जीवित रहेंगी।
https://www.indiatv.in/entertainment/bollywood/who-was-nana-patekar-godfather-in-bollywood-forced-into-films-against-his-will-revealed-secret-on-aap-ki-adalat-2026-10-08-1247716