गेंदे की खेती करने वाले किसान बरतें सावधानी, मिट्टी में छिपे इस बड़े खतरे से ऐसे बचाएं अपनी पूरी फसल

गेंदे की खेती में मिट्टी जनित रोग पूरी फसल को तबाह कर सकते हैं, विशेषज्ञों ने किसानों को नर्सरी के स्तर से ही बचाव के ठोस उपाय अपनाने की सलाह दी है।

भारत में फूलों की व्यावसायिक खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसमें गेंदा सबसे लोकप्रिय और मुनाफेदार फूलों में से एक बनकर उभरा है। पूजा-पाठ, वैवाहिक आयोजन, त्योहारों में सजावट और माला बनाने के अलावा गेंदे का औद्योगिक महत्व भी बहुत ज्यादा है, क्योंकि इससे ल्यूटिन नामक रंगद्रव्य निकाला जाता है। यही वजह है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए गेंदा एक प्रमुख नकदी फसल बन चुका है। हालांकि, गेंदे की खेती में मुनाफा तभी कमाया जा सकता है, जब फसल पूरी तरह स्वस्थ और रोगमुक्त हो। अक्सर मिट्टी में छिपे अदृश्य रोगजनक पूरी फसल को बर्बाद कर देते हैं।

गेंदे की खेती के आंकड़े और महत्व

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पादप रोग विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार, देश में फूलों की खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2024-25 के दौरान देश भर में लगभग 3.98 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फूलों की खेती की गई, जिसमें अकेले गेंदे का कुल उत्पादन लगभग 11.4 लाख टन रहा। इस कुल उत्पादन में बिहार राज्य की हिस्सेदारी लगभग 4.7 प्रतिशत आंकी गई है। डॉक्टर सिंह का कहना है कि किसानों को बाजार में गेंदे के फूलों के अच्छे दाम तभी मिल सकते हैं, जब उनकी गुणवत्ता बेहतरीन हो। इसके लिए फसल को नर्सरी के स्तर से ही बीमारियों से बचाना बेहद जरूरी है।

नर्सरी से ही शुरू हो जाती है बीमारी की शुरुआत

गेंदे की फसल में लगने वाले अधिकांश रोग मिट्टी से ही पनपते हैं। इन मृदा-जनित रोगों के फैलने के मुख्य स्रोतों में दूषित बीज, संक्रमित मिट्टी, सिंचाई का पानी या फिर खेती में इस्तेमाल होने वाले औजार शामिल हो सकते हैं। जब खेतों या नर्सरी में बहुत अधिक नमी जमा हो जाती है और जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं होती, तब ये हानिकारक कवक और रोगजनक तेजी से सक्रिय हो जाते हैं और पौधों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते हैं।

इन प्रमुख रोगों से किसानों को रहना होगा सावधान

गेंदे की फसल को बर्बाद करने वाले कुछ मुख्य रोग इस प्रकार हैं:

  • आर्द्र-पतन या डैम्पिंग-ऑफ: यह नर्सरी के दौर में लगने वाला सबसे घातक और गंभीर रोग है। इसमें या तो बीज अंकुरित होने से पहले ही मिट्टी के अंदर सड़ जाते हैं, या फिर अंकुर निकलने के बाद उनका कोमल तना गलकर जमीन पर गिर जाता है। इस बीमारी के लिए मुख्य रूप से पीथियम, राइजोक्टोनिया और फ्यूजेरियम नामक कवक जिम्मेदार होते हैं।
  • जड़ एवं कॉलर सड़न: इस बीमारी में पीथियम और फाइटोफ्थोरा जैसे कवक सीधे पौधों की जड़ों पर आक्रमण करते हैं। इसके प्रभाव से पौधे धीरे-धीरे पीले पड़ने लगते हैं, मुरझा जाते हैं और अंततः पूरे के पूरे समूह में सूखकर नष्ट हो जाते हैं।
  • फ्यूजेरियम उकठा रोग: इस रोग के लक्षण दिखाई देने पर गेंदे के पौधे की निचली पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और एक तरफ से मुरझाने लगती हैं। प्रभावित पौधे के तने को काटने पर अंदर की नसें भूरे रंग की दिखाई देती हैं। इस बीमारी का कारक मिट्टी में बहुत लंबे समय तक जीवित रहने की क्षमता रखता है।

फसल सुरक्षा के लिए अपनाएं ये वैज्ञानिक उपाय

डॉ. एस.के. सिंह का सुझाव है कि बीमारी आने के बाद इलाज करने की तुलना में रोपाई से पहले ही बचाव के कदम उठाना ज्यादा समझदारी है। किसानों को निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए:

  • उन्नत क्यारियों का निर्माण: नर्सरी के लिए हमेशा ऐसी जमीन का चुनाव करें जो थोड़ी ऊंचाई पर हो और जहां पानी के निकास की अच्छी व्यवस्था हो। नर्सरी की क्यारियां जमीन की सतह से कम से कम 15-20 सेंटीमीटर ऊंची होनी चाहिए।
  • मृदा सौरीकरण (सॉइल सोलराइजेशन): गर्मियों के दिनों में इस तकनीक का उपयोग बहुत फायदेमंद होता है। इसके तहत खेत की मिट्टी को अच्छी तरह नम करके पारदर्शी पॉलीथिन शीट से करीब 4-6 सप्ताह के लिए ढक दिया जाता है। तेज धूप और गर्मी से मिट्टी के भीतर मौजूद सभी हानिकारक रोगजनक कवक नष्ट हो जाते हैं।
  • जैविक उपचार के रूप में ट्राइकोडर्मा: अच्छी गुणवत्ता वाले ट्राइकोडर्मा हारजियनम को अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर नर्सरी और मुख्य खेत की मिट्टी में मिलाना चाहिए। इसके अलावा स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस का इस्तेमाल भी काफी सुरक्षा प्रदान करता है।
  • फसल चक्र का पालन: एक ही खेत में लगातार गेंदे की फसल उगाने से बचें। मिट्टी की सेहत और रोगों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए गेंदे के बाद अनाज वाली फसलों का चक्र अपनाना चाहिए।
  • सफाई और सही उपचार: यदि खेत में कोई पौधा संक्रमित या मुरझाया हुआ दिखाई दे, तो उसे तुरंत जड़ सहित उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। बिना बीमारी की सही पहचान किए किसी भी फफूंदनाशक दवा का छिड़काव न करें। इस संबंध में अधिक जानकारी और सही सलाह के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से संपर्क करना चाहिए।

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