नशे के खिलाफ अनूठी अलख जगा रहे स्वामी नरेशानंद
आज के दौर में नशे की लत ने देश के युवाओं को बुरी तरह अपनी चपेट में ले लिया है। अक्सर मंचों से नशे के खिलाफ भाषण दिए जाते हैं और बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, लेकिन हरियाणा के पानीपत से एक ऐसी यात्रा शुरू हुई है जो इन सबसे काफी अलग है। 77 वर्षीय संत स्वामी नरेशानंद सैनाचार्य ने समाज में फैली इस कुरीति को जड़ से मिटाने का बीड़ा उठाया है। वह अपने आश्रम के सुखद वातावरण को छोड़कर सड़क पर उतरे हैं ताकि सीधे युवाओं के बीच जाकर उन्हें इस जहर से आगाह कर सकें।
रथ के जरिए जन-जन तक पहुंचा रहे संदेश
स्वामी नरेशानंद सैनाचार्य की इस मुहिम का मुख्य केंद्र उनका विशेष रूप से तैयार किया गया रथ है। इस रथ की दीवारों पर नशे के दुष्प्रभावों के बारे में श्लोक और प्रभावशाली संदेश लिखे गए हैं। यह रथ जब गांव-गांव और शहर-शहर गुजरता है, तो लोगों का ध्यान स्वतः ही उस पर लिखे संदेशों की ओर आकर्षित होता है। सनातन संस्कृति जागृति ट्रस्ट के बैनर तले निकाली जा रही इस 'सेवा संकल्प-नशा मुक्ति अभियान यात्रा' का मकसद केवल उपदेश देना नहीं, बल्कि युवाओं को नशे से दूर रहने का संकल्प दिलाना है। स्वामी नरेशानंद का मानना है कि नशे की समस्या केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका दंश पूरे परिवार को दशकों तक झेलना पड़ता है।
आश्रम का दर्द बना प्रेरणा
अपनी यात्रा के उद्देश्यों पर चर्चा करते हुए स्वामी नरेशानंद ने बताया कि उनके आश्रम में अक्सर ऐसे माता-पिता आते हैं जो अपने बच्चों की बिगड़ती आदतों को लेकर घोर निराशा में होते हैं। कई अभिभावकों का दर्द देखकर उन्होंने महसूस किया कि केवल आश्रम में बैठकर राह दिखाना काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि युवाओं को समय रहते जागरूक करना जरूरी है ताकि वे इस दलदल में पैर रखने से पहले ही इसके भयावह परिणामों को समझ सकें। 77 साल की उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाना उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है।
यात्रा का सफर और पड़ाव
यह यात्रा डेढ़ हजार किलोमीटर से भी अधिक लंबी दूरी तय करेगी। स्वामी नरेशानंद के साथ करीब 10 से 12 लोगों की समर्पित टीम लगातार चल रही है। उनके काफिले में चार-पांच अन्य वाहन भी शामिल हैं जो यात्रा की व्यवस्था देख रहे हैं। यात्रा के पड़ावों के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा कि इसकी शुरुआत पानीपत से हुई, जिसे कैबिनेट मंत्री मनोहर लाल के प्रतिनिधि ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। अंबाला के बाद यह यात्रा अब चंडीगढ़ की ओर बढ़ रही है। चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और महामहिम राज्यपाल को ज्ञापन सौंपने की तैयारी है। इसके बाद यात्रा का कारवां वाघा बॉर्डर, अमृतसर, लुधियाना, बठिंडा, पटियाला, हिसार, कैथल और नारनौल जैसे महत्वपूर्ण शहरों से होकर गुजरेगा।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ा प्रदर्शन
इस पूरी यात्रा का अंतिम पड़ाव राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर है। यहाँ स्वामी नरेशानंद भारत सरकार के समक्ष अपनी मांगें रखेंगे। उनका प्रमुख आग्रह है कि देश में मादक पदार्थों की तस्करी को रोकने के लिए सरकार ठोस और प्रभावी कदम उठाए। इसके बाद यात्रा वापस पानीपत लौटेगी, जहाँ इसका समापन होगा। स्वामी का कहना है कि युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी और शक्ति होते हैं। यदि यह शक्ति नशे की भेंट चढ़ गई, तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा।
आध्यात्मिकता से जुड़ाव का संकल्प
इस अभियान का एक बड़ा हिस्सा युवाओं को आध्यात्मिकता की ओर मोड़ना भी है। स्वामी नरेशानंद का मानना है कि यदि युवाओं की ऊर्जा सही दिशा में लगे, तो वे न केवल अपना बल्कि समाज और परिवार का भी गौरव बढ़ा सकते हैं। उनका यह सफर केवल नशा मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युवाओं में सही दृष्टिकोण विकसित करने की एक कोशिश है। यह जागरूकता अभियान दिखा रहा है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो उम्र की कोई सीमा आड़े नहीं आती। समाज के हर वर्ग को इस मुहिम में शामिल होकर युवाओं को सही दिशा दिखाने का प्रयास करना चाहिए।
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