एशियन गेम्स में भारत के नाम एक और बड़ी उपलब्धि
भारतीय मुक्केबाजी के लिए एशियन गेम्स का यह संस्करण बेहद यादगार साबित हो रहा है। भारत के होनहार खिलाड़ी अंकुश पंघाल ने शानदार खेल का प्रदर्शन करते हुए 80 किलोग्राम भारवर्ग में स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। फाइनल मुकाबले में उन्होंने दक्षिण कोरिया के मुक्केबाज किन मिएनसांग को 4-0 के अंतर से एकतरफा मात दी। यह जीत इसलिए भी बेहद खास है क्योंकि पुरुषों की मुक्केबाजी स्पर्धा में भारत को पूरे 8 साल के लंबे इंतजार के बाद गोल्ड मेडल नसीब हुआ है। इससे पहले भी अंकुश अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं, उन्होंने 2026 के कॉमनवेल्थ गेम्स में भी बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक पर अपना कब्जा जमाया था। अंकुश की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद पदक तालिका में भारत की स्थिति और मजबूत हुई है और देश अब 5वें स्थान पर पहुंच गया है।
बॉक्सिंग में रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन
इस बार के एशियन गेम्स भारतीय मुक्केबाजी के लिए अब तक के सबसे सफल खेलों में से एक साबित हुए हैं। भारत ने बॉक्सिंग में कुल 6 पदक अपने नाम किए हैं, जिनमें 3 गोल्ड और 3 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। इससे पहले लवलीना बोरगोहेन ने 75 किलोग्राम वर्ग में और परवीन हुडा ने 65 किलोग्राम भारवर्ग में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतकर गौरव बढ़ाया था। एशियन गेम्स के पूरे इतिहास में स्वर्ण पदकों की संख्या के मामले में यह भारतीय मुक्केबाजी टीम का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। अन्य पदक विजेताओं में प्रिया घंघास (60 कि.ग्रा.), कपिल पोखरिया (90 कि.ग्रा.) और नरेंद्र बेरवाल (+90 कि.ग्रा.) शामिल हैं, जिन्होंने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। यदि हम साल 2010 के ग्वांगझू एशियन गेम्स की बात करें, तो उस समय भारत ने कुल 9 पदक जीते थे, लेकिन तब स्वर्ण पदकों की संख्या केवल 2 थी।
कौन हैं अंकुश पंघाल?
21 वर्षीय अंकुश पंघाल का सफर काफी प्रेरणादायक है। वे हरियाणा के हिसार जिले के भेरिया गांव के एक सामान्य किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका जन्म 13 अगस्त 2005 को हुआ था। उनके पिता सुरेश पंघाल स्वयं भी खेलों के शौकीन रहे हैं और एक कबड्डी खिलाड़ी थे। यही कारण है कि अंकुश की खेलों में रुचि बचपन से ही रही। शुरुआती दौर में उन्होंने कबड्डी को ही अपना करियर चुना और जिला स्तर पर स्वर्ण पदक भी हासिल किया। हालांकि, पिता के मार्गदर्शन और सलाह पर उन्होंने अपने खेल में बदलाव करने का निर्णय लिया और बॉक्सिंग रिंग में कदम रखा। आज उनकी कड़ी मेहनत और पिता के दिए गए सुझाव का ही परिणाम है कि वे पूरे देश के लिए गोल्ड मेडल लेकर आए हैं।
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