पूर्णिया के छात्रों का कमाल: महज 5500 रुपये में तैयार किया AI रोबोट 'नोवा', हिंदी-अंग्रेजी में करेगा हर बात

बिहार के पूर्णिया में पॉलिटेक्निक कॉलेज के छात्रों ने एक अनूठा AI आधारित रोबोट विकसित किया है। यह रोबोट महज 5500 रुपये की लागत से बना है और हिंदी व अंग्रेजी में लोगों की हर जिज्ञासा का समाधान कर सकता है।

पूर्णिया की तकनीकी प्रतिभा का कमाल

बिहार के पूर्णिया स्थित राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के होनहार छात्रों ने अपनी मेहनत और नवाचार का बेहतरीन नमूना पेश किया है। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के पांचवें सेमेस्टर में पढ़ने वाले चार छात्रों की टीम ने मिलकर एक AI आधारित सर्विस रोबोट विकसित किया है, जिसका नाम 'नोवा' रखा गया है। इस रोबोट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे तैयार करने में मात्र 5500 रुपये की लागत आई है, जो इसे तकनीकी क्षेत्र में एक किफायती और प्रभावी समाधान बनाती है। यह रोबोट न केवल हिंदी और अंग्रेजी में बातचीत करने में सक्षम है, बल्कि यह उपयोगकर्ताओं को विभिन्न प्रकार की जानकारियां देने और भविष्य में कई तरह के जटिल कार्य करने के लिए भी डिजाइन किया गया है।

चार छात्रों की एक महीने की मेहनत

इस अद्भुत 'नोवा' रोबोट को साकार करने का श्रेय कॉलेज के चार छात्रों आर्यन कुमार, आनंद कुमार, राजीव कुमार पंडित और शंकर कुमार को जाता है। इन छात्रों ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ इस प्रोजेक्ट पर काम करने का फैसला लिया। छात्रों ने बताया कि इस रोबोट को पूरी तरह से तैयार करने में उन्हें लगभग एक महीने का समय लगा। इस दौरान उन्होंने तकनीकी बारीकियों को समझा और इसे एक व्यावहारिक रूप दिया। चार फीट लंबा यह रोबोट अपनी बनावट और कार्यक्षमता के कारण कॉलेज परिसर में चर्चा का केंद्र बन गया है।

मौसम से लेकर सामान्य ज्ञान तक, सब कुछ बताएगा नोवा

छात्रों के अनुसार, 'नोवा' केवल एक मशीन नहीं है बल्कि यह एक सक्रिय AI असिस्टेंट के रूप में कार्य करता है। यदि आप इससे आज के मौसम के बारे में पूछेंगे, तो यह आपको सटीक जानकारी प्रदान करेगा। इसके अलावा, यह सामान्य ज्ञान के सवालों के जवाब देने, गाने सुनाने और अन्य आवश्यक जानकारी साझा करने में पूरी तरह समर्थ है। छात्रों की योजना इसे यहीं तक सीमित रखने की नहीं है। वे भविष्य में इसे एक मल्टी-फंक्शनल रोबोट के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि यह सामान ढोने और एक स्थान से दूसरे स्थान तक उसे पहुंचाने जैसे शारीरिक श्रम वाले काम भी कर सके।

महज 5500 रुपये में आधुनिक तकनीक का संगम

इतने कम बजट में इतने उन्नत रोबोट का निर्माण करना वाकई चुनौतीपूर्ण था। छात्रों ने साझा किया कि इस रोबोट के निर्माण में उन्होंने आधुनिक उपकरणों और सेंसर का कुशल तालमेल बिठाया है। इसमें ड्राइविंग सिस्टम, ब्लूटूथ, वाई-फाई मॉड्यूल, अत्याधुनिक प्रोसेसर, ESP32, बैटरी, माइक्रोफोन और AI असिस्टेंट जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों का इस्तेमाल किया गया है। छात्रों का दावा है कि ये सभी संसाधन मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं जो यूजर की हर कमांड को समझकर उसका जवाब देने में सक्षम है।

प्रोफेसर की प्रेरणा से शुरू हुआ सफर

इस प्रोजेक्ट की शुरुआत अचानक नहीं हुई। कॉलेज के फैकल्टी सदस्य प्रोफेसर अमन कुमार ने इन छात्रों को रोबोटिक क्षेत्र में कुछ नया करने के लिए प्रोत्साहित किया था। प्रोफेसर की सलाह के बाद ही इन चारों छात्रों ने एक टीम बनाई और इस रोबोट पर काम करना शुरू किया। लगातार एक महीने की कड़ी मेहनत और शोध का परिणाम आज 'नोवा' के रूप में सबके सामने है। छात्रों की इस उपलब्धि से न केवल उनका बल्कि उनके संस्थान का नाम भी गौरवान्वित हुआ है।

भविष्य की योजनाएं: अस्पताल से मॉल तक उपयोग

छात्रों की दृष्टि इस रोबोट के व्यावसायिक उपयोग पर भी है। उनका मानना है कि यदि उन्हें सरकार या किसी बड़े तकनीकी संस्थान से सहयोग मिलता है, तो इसे बड़े पैमाने पर विकसित किया जा सकता है। भविष्य में इस रोबोट को रेलवे स्टेशन, बड़े अस्पताल, मॉल्स, सरकारी कार्यालयों, रेस्टोरेंट और पार्सल डिलीवरी सेवाओं में तैनात किया जा सकता है। उनका उद्देश्य एक ऐसा तकनीकी तंत्र विकसित करना है जो न केवल लोगों का मनोरंजन करे बल्कि सेवा क्षेत्र की जरूरतों को भी प्रभावी ढंग से पूरा कर सके।

प्राचार्य ने की सराहना और सहयोग का वादा

राजकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज के प्राचार्य, डॉ. प्रोफेसर मोहम्मद लतीफ ने छात्रों की इस सफलता पर खुशी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि पूर्णिया का यह कॉलेज हमेशा से तकनीकी प्रतिभाओं को तराशने का काम करता रहा है, और यहां के छात्र लगातार नए प्रोजेक्ट्स के माध्यम से अपनी क्षमता सिद्ध कर रहे हैं। उन्होंने छात्रों को भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं और सरकार से इस अनूठे आविष्कार को पेटेंट कराने में मदद करने की अपील की। प्राचार्य ने जोर देते हुए कहा कि इस तरह के नवाचार न केवल राज्य के लिए बल्कि देश के तकनीकी विकास के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।

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