राजस्थान की अनूठी लोक-परंपरा
पितृ पक्ष का समय भारतीय संस्कृति में अपने पूर्वजों को याद करने, उनका तर्पण करने और दान-पुण्य करने का पावन अवसर माना जाता है। इस दौरान देश भर में लोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। हालांकि, राजस्थान के जालोर जिले में एक ऐसी परंपरा भी है जो न केवल पूर्वजों के प्रति श्रद्धा दर्शाती है, बल्कि जीव-दया का भी अद्भुत संदेश देती है। यहां के निम्बावास गांव में कीड़ी-नगरा नामक स्थान पर श्राद्ध पक्ष के दौरान चींटियों को भोजन कराने की विशेष परंपरा निभाई जाती है। यह स्थान प्रकृति और धर्म के अनूठे संगम के रूप में जाना जाता है।
150 बीघा में फैला कीड़ी-नगरा
जालोर जिले के भीनमाल से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित निम्बावास गांव में यह कीड़ी-नगरा बना हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह क्षेत्र करीब 150 बीघा की विशाल भूमि में फैला है। इस जगह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां चींटियों की बहुत बड़ी आबादी प्राकृतिक रूप से रहती है। गौर करने वाली बात यह है कि यहां पाई जाने वाली चींटियां आम तौर पर घरों में दिखाई देने वाली चींटियों से आकार में काफी बड़ी होती हैं। शायद यही कारण है कि यह स्थान आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है।
पितरों के नाम पुण्य का मार्ग
पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पितरों की शांति के लिए विभिन्न उपाय करते हैं। इस क्षेत्र के निवासी मानते हैं कि यदि श्राद्ध पक्ष के दिनों में चींटियों को आटा, शक्कर और अनाज खिलाया जाए, तो इससे पितरों को तृप्ति मिलती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। स्थानीय निवासी शैतान सिंह भाटी का कहना है कि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और लोग इसे अपने पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले दान का ही एक हिस्सा मानते हैं। हालांकि यह एक धार्मिक आस्था से जुड़ी मान्यता है, लेकिन लोगों का विश्वास है कि जीवों की सेवा करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
अमावस्या और पूर्णिमा पर उमड़ती है भीड़
कीड़ी-नगरा में केवल श्राद्ध पक्ष ही नहीं, बल्कि वर्ष भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। विशेष रूप से अमावस्या और पूर्णिमा के दिनों में यहां का नजारा किसी मेले जैसा हो जाता है। इन तिथियों पर जालोर के अलावा सिरोही, पाली और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी बड़ी संख्या में लोग अपनी श्रद्धा लेकर यहां पहुंचते हैं। श्रद्धालु अपने साथ आटा और शक्कर लेकर आते हैं और पूरी भक्ति के साथ उसे चींटियों के लिए अर्पित करते हैं। वहां के वातावरण में एक विशेष तरह की सकारात्मकता और सेवा भाव का अनुभव किया जा सकता है।
जीव-दया और लोक-संस्कृति का संदेश
इस परंपरा का एक गहरा दार्शनिक पक्ष यह भी है कि इसमें छोटे से छोटे जीव के प्रति करुणा और दया का भाव निहित है। श्राद्ध पक्ष में जब लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं, तो वे प्रकृति के अन्य जीवों को भी भोजन देना अपना कर्तव्य समझते हैं। यह कीड़ी-नगरा न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह हमारी उस प्राचीन लोक-संस्कृति का भी प्रतीक है, जो मनुष्य को समस्त जीव-जगत के साथ जोड़कर देखती है। चींटियों को दाना डालने की यह क्रिया सेवा भाव और परोपकार को बढ़ावा देती है। निम्बावास का कीड़ी-नगरा आज अपनी इसी विशिष्ट पहचान और आस्था के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो चुका है, जहां लोग पितरों के नाम पर पुण्य कमाने के साथ-साथ जीव-सेवा का लाभ भी उठाते हैं।
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