वेतन वृद्धि के प्रस्ताव पर लगा विराम
जम्मू-कश्मीर के विधायकों और मंत्रियों के लिए वेतन और भत्तों में बढ़ोतरी का सपना फिलहाल पूरा नहीं होगा। हालिया घटनाक्रम में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने उन विधेयकों को वापस ले लिया है, जिनमें जन प्रतिनिधियों की सुविधाओं को बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया था। भारतीय जनता पार्टी के विधायकों द्वारा दर्ज किए गए कड़े एतराज के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्पष्ट किया कि यदि सदन का कोई भी सदस्य इस तरह की बढ़ोतरी का विरोध करता है, तो सरकार इसे आगे नहीं बढ़ाएगी।
मुख्यमंत्री ने बताई फैसले की वजह
सदन में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि हालांकि हाउस कमेटी ने वेतन और भत्तों में वृद्धि की सिफारिश की थी और उस रिपोर्ट में असहमति का कोई नोट भी मौजूद नहीं था, फिर भी सरकार ने इसे वापस लेने का निर्णय लिया है। उन्होंने भाजपा सदस्यों पर निशाना साधते हुए कहा कि एक तरफ वे खुद वेतन बढ़ाने की इच्छा रखते थे, लेकिन दूसरी ओर दिहाड़ी मजदूरों की समस्याओं का हवाला देकर इस पूरे विषय को राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने सदन को साफ शब्दों में कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से कभी भी इस बढ़ोतरी के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने घोषणा की कि यदि एक भी सदस्य इसका विरोध करेगा, तो यह बिल पारित नहीं होगा। इसके बाद, सदन ने बहुमत के साथ इन विधेयकों को वापस लेने के पक्ष में मतदान किया।
क्या था प्रस्तावित वेतन का गणित
गौरतलब है कि विधानसभा में कुल पांच विधेयक पेश किए गए थे, जिनका उद्देश्य न केवल वर्तमान विधायकों और मंत्रियों के वेतन व भत्तों में संशोधन करना था, बल्कि पूर्व विधायकों की पेंशन राशि में भी बढ़ोतरी की जानी थी। यदि यह प्रस्ताव पारित हो जाता, तो विधायकों की मौजूदा कुल मासिक आय 1.8 लाख रुपये से बढ़कर 3 लाख रुपये प्रति माह तक पहुंच सकती थी। चूंकि मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला स्वयं कानून, न्याय और संसदीय मामलों के विभाग के प्रभारी हैं, इसलिए यह विधेयक उनके मंत्रालय की ओर से ही पेश किया गया था, लेकिन राजनीतिक विरोध के चलते इसे अमल में नहीं लाया जा सका।
पंचायत चुनाव और 'सही समय' पर तंज
वेतन संबंधी विवाद के अलावा, मुख्यमंत्री ने सदन में पंचायत चुनावों को लेकर भाजपा के रुख पर भी तंज कसा। जब भाजपा की ओर से राज्य का दर्जा बहाल करने को लेकर 'सही समय' का हवाला दिया जाता है, तो उस पर प्रतिक्रिया देते हुए उमर अब्दुल्ला ने कहा कि पंचायत चुनावों के मामले में भी सरकार उसी भाषा का इस्तेमाल करेगी। उन्होंने कटाक्ष करते हुए कहा कि जब भी पंचायत चुनाव की समयसीमा के बारे में पूछा जाएगा, तो सरकार यही कहेगी कि ये चुनाव 'सही समय' पर आयोजित किए जाएंगे। मुख्यमंत्री ने इस बात पर सवाल खड़े किए कि आखिर 'सही समय' का पैमाना क्या है और इसे तय करने वाली शर्तें क्या होंगी, क्योंकि भाजपा ने आज तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि उनके द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे इस शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा बार-बार राज्य की स्थिति पर वही रटा-रटाया जवाब देती है, तो सरकार भी उनसे इसी तरह पेश आने को मजबूर है।
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