हिमाचल की राजनीति के दिग्गज और पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया का 87 वर्ष की आयु में निधन

हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ राजनेता और पांच बार विधायक रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने 87 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। वे अपने बेबाक अंदाज और वीरभद्र सिंह के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के लिए जाने जाते थे।

हिमाचल की राजनीति ने एक कद्दावर चेहरा खोया

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले और पांच बार के विधायक एवं दो बार के मंत्री रहे मेजर विजय सिंह मनकोटिया का निधन हो गया है। उन्होंने 87 साल की उम्र में कांगड़ा जिले के अपने पैतृक गांव त्यारा में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर दौड़ गई है। बताया जा रहा है कि मंगलवार सुबह अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी, जिसके बाद परिजन उन्हें फोर्टिस अस्पताल ले जा रहे थे। रास्ते में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनका निधन हो गया।

सीडी कांड से बदली थी प्रदेश की सियासी तस्वीर

मेजर मनकोटिया अपने लंबे राजनीतिक सफर में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों का हिस्सा रहे। हालांकि, उन्हें हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में जाना जाता था। साल 2007 में उन्होंने एक चर्चित सीडी कांड के जरिए प्रदेश की सियासत में भूचाल ला दिया था। उन्होंने 27 मई 2007 को एक सीडी सार्वजनिक की थी, जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और उस समय के डीसी महेंद्र सिंह के बीच पैसों के लेन-देन का दावा किया गया था। यह रिकॉर्डिंग 1989 की बताई गई थी और आरोप लगाया गया था कि दाड़लाघाट में सीमेंट प्लांट को मंजूरी देने के बदले में पद का दुरुपयोग किया गया था। हालांकि, बाद के वर्षों में इस मामले में वीरभद्र सिंह बरी हो गए थे।

सेना से लेकर एयर इंडिया तक का सफर

मेजर मनकोटिया का प्रारंभिक जीवन उपलब्धियों से भरा रहा। उन्होंने साल 1959 में यूपीएससी की परीक्षा में ऑल इंडिया मेरिट लिस्ट में पांचवां स्थान प्राप्त किया था। वर्ष 1960 में वे देहरादून की इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में शामिल हुए। उनका सैन्य करियर बेहद शानदार रहा, जिसमें उन्होंने 1962 की गणतंत्र दिवस परेड में आईएमए की टुकड़ी का नेतृत्व किया था। वे आईएमए के अंतिम कैडेट कमांडर भी रहे। जून 1962 में कमीशन मिलने के बाद उन्होंने गोरखा राइफल्स में सेवा दी। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1971 के बांग्लादेश युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया। 1976 में उन्होंने सेना से सेवानिवृत्ति ली और इसके बाद जेआरडी टाटा के प्रस्ताव पर एयर इंडिया में पांच साल तक कार्यरत रहे।

राजनीतिक शुरुआत और उपलब्धियां

मेजर मनकोटिया ने वर्ष 1982 में राजनीति में कदम रखा। उन्होंने शाहपुर विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमाई और शानदार जीत हासिल की। अपने राजनीतिक करियर में वे कुल पांच बार विधायक चुने गए। सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्होंने पर्यटन, नागरिक उड्डयन और कानून जैसे महत्वपूर्ण विभागों की कमान संभाली। वर्ष 2024 में उन्होंने लंबे समय से जुड़े कांग्रेस पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था।

लेखन और व्यक्तिगत जीवन

राजनीति और सैन्य सेवा के अलावा मेजर मनकोटिया की रुचि लेखन में भी थी। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें द पैटर्न्स ऑफ डेस्टिनी, टर्मॉइल और अपहीवल शामिल हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने सामाजिक न्याय और समानता पर अपने दृष्टिकोण को साझा किया। वे रवींद्रनाथ टैगोर और प्लेटो को अपना मार्गदर्शक मानते थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी जयश्री कुमारी हैं, जो राजस्थान के कोटा कुनाड़ी की रहने वाली हैं। उनके परिवार में एक बेटा सूर्यवीर सिंह और एक बेटी संयुक्ता कुमारी भी हैं। उनका निधन हिमाचल प्रदेश के लिए एक बड़ी क्षति है, क्योंकि वे उन चुनिंदा नेताओं में से थे जिन्होंने सैन्य अनुशासन और राजनीति की जटिलताओं को बहुत करीब से देखा और जिया था।

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