शहीद भगत सिंह जयंती: पीएम मोदी ने किया नमन, बोले- फांसी नहीं, सीधे गोली का आग्रह उनके अदम्य साहस का प्रमाण था

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमर क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्होंने एक वीडियो संदेश के माध्यम से भगत सिंह के शौर्य और देश के प्रति उनके बलिदान को युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बताया।

राष्ट्रनायक भगत सिंह को प्रधानमंत्री की भावपूर्ण श्रद्धांजलि

भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले महान क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नमन किया है। इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक भावुक संदेश साझा करते हुए कहा कि शहीद भगत सिंह का अदम्य साहस और उनका बलिदान सदैव देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा प्रतीक बना रहेगा।

साहस का प्रतीक और प्रेरणा का केंद्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संदेश में कहा कि भगत सिंह ने अपने अद्भुत शौर्य से देश की आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा और धार प्रदान की थी। राष्ट्र के सम्मान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने का जो जज्बा भगत सिंह में था, वह आज भी भारत के हर युवा की हिम्मत और हौसले को बढ़ाता है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर एक वीडियो संदेश भी जारी किया, जिसमें उन्होंने भगत सिंह के जीवन के उन पहलुओं का जिक्र किया जो उन्हें अन्य क्रांतिकारियों से अलग खड़ा करते हैं।

अंग्रेजों के सामने रखी थी एक अनोखी मांग

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने वीडियो संदेश में उस ऐतिहासिक घटना का उल्लेख किया जब भगत सिंह ने अंग्रेजों को पत्र लिखा था। उन्होंने कहा, भगत सिंह निर्भीकता और साहस की प्रतिमूर्ति थे। फांसी के फंदे पर चढ़ने से पहले उन्होंने अंग्रेजों के सामने एक मांग रखी थी कि उन्हें और उनके साथियों को युद्धबंदी माना जाए। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि उन्हें फांसी के तख्ते पर न लटकाया जाए, बल्कि सीधे गोली मारकर उनकी जान ली जाए। प्रधानमंत्री ने इसे भगत सिंह के साहस का बड़ा प्रमाण करार दिया। उन्होंने आगे कहा कि भगत सिंह न केवल एक क्रांतिकारी थे, बल्कि वे लोगों के दुख और पीड़ा के प्रति अत्यंत संवेदनशील भी थे और हमेशा जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्पर रहते थे।

क्रांति की मशाल और संघर्ष का सफर

क्रांति के पुरोधा सरदार भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को अविभाजित पंजाब प्रांत में हुआ था। उनकी क्रांतिकारी यात्रा बहुत कम उम्र में ही शुरू हो गई थी। जब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ, तब उनकी आयु मात्र 12 साल थी। वर्ष 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह से आजादी के महासमर में कूद पड़े।

इतिहास में दर्ज महत्वपूर्ण घटनाक्रम

भगत सिंह ने अपने साथियों के साथ मिलकर लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेने के लिए अंग्रेज अधिकारी सांडर्स को सबक सिखाया, जिसने उन्हें देशभर में एक बड़े क्रांतिकारी के रूप में स्थापित कर दिया। उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव 8 अप्रैल 1929 को आया, जब उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर इंकलाब जिंदाबाद का उद्घोष करते हुए सेंट्रल असेंबली में बम धमाका किया। इस घटना के बाद उन पर, राजगुरु और सुखदेव सहित अन्य क्रांतिकारियों पर मुकदमा चलाया गया। अंततः अंग्रेजी हुकूमत ने उनके बढ़ते प्रभाव से भयभीत होकर 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर चढ़ा दिया, लेकिन उनकी कुर्बानी भारतीय इतिहास में अमर हो गई।

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