बिना किसी मशीन के मानसून की विदाई का सटीक संकेत देती है यह पुरानी कहावत

आधुनिक युग से पहले लोग प्रकृति के संकेतों को देखकर मानसून की विदाई का पता लगाते थे। आज भी कुछ ऐसे पारंपरिक तरीके मौजूद हैं, जो मौसम का सटीक अंदाजा देते हैं।

पुराने जमाने के मानसून संकेत

खेती और किसानी के लिए मानसून का चक्र समझना बेहद आवश्यक है। आज भले ही हमारे पास आधुनिक तकनीक और मौसम विज्ञान की उन्नत मशीनें मौजूद हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब किसान केवल प्रकृति के बदलावों को देखकर मानसून के आगमन और विदाई का सटीक आकलन कर लेते थे। अमेठी के अनुभवी बुजुर्ग सूर्यपाल यादव के अनुसार, पुरानी पीढ़ी के पास मौसम समझने की ऐसी तकनीकें थीं जो आज के डिजिटल युग में भी प्रभावी मानी जाती हैं।

जब खेतों में फूलती है कास

मानसून कब जा रहा है, इसका सबसे महत्वपूर्ण संकेत खेतों में उगने वाली कास (एक प्रकार की घास) है। बुजुर्गों के बीच एक पुरानी कहावत प्रचलित है कि जब खेतों में फूली कास, तब जानो गई बरसात। जब खेतों की मेड़ों पर कास पर सफेद रंग के फूल आने लगते हैं, तो यह स्पष्ट संकेत होता है कि अब मानसून की विदाई का समय निकट है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मानसून खत्म होने का सबसे भरोसेमंद पारंपरिक पैमाना माना जाता है।

मानसून विदाई के अन्य प्राकृतिक लक्षण

सूर्यपाल यादव के अनुसार, कास के अलावा भी कई अन्य संकेत हैं जो मानसून के अंत का संदेश देते हैं। मानसून की विदाई को समझने के लिए कुछ मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • पाखी का दिखना बंद होना: घरों में अक्सर बरसात के दौरान चींटियों के पंख वाले कीट जिन्हें पाखी कहा जाता है, रोशनी के आसपास दिखाई देते हैं। जब इनका दिखना बंद हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि बारिश का मौसम विदा हो चुका है।
  • आसमान का साफ होना: जब आकाश में बादलों की आवाजाही बंद हो जाए और तेज धूप खिली रहने लगे, तो यह स्पष्ट करता है कि मानसून अब लौट गया है।
  • फसलों का रंग बदलना: धान और बाजरे की फसलों में बालियों का निकल आना और उनका हल्का पीला पड़ना इस बात का सूचक है कि फसलों को अब नमी के बजाय तेज धूप की आवश्यकता है। यह परिवर्तन मानसून के समापन का बड़ा संकेत है।

आधुनिकता बनाम पारंपरिक ज्ञान

पहले के दौर में वैज्ञानिक उपकरण और तकनीक उपलब्ध नहीं थे, ऐसे में कृषक पूरी तरह से इन प्राकृतिक संकेतों पर निर्भर रहते थे। ये तरीके न केवल सरल थे, बल्कि बेहद सटीक भी होते थे। आज की पीढ़ी भले ही वैज्ञानिक विधियों पर अधिक विश्वास करती हो, लेकिन सूर्यपाल यादव का मानना है कि पुराने जमाने की इन तकनीकों का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। हालांकि, आधुनिक वैज्ञानिक युग के कारण इन पारंपरिक तरीकों की जानकारी अब सीमित होती जा रही है, फिर भी ग्रामीण अंचलों में इनका उपयोग आज भी देखा जा सकता है। ये संकेत प्रकृति और खेती के गहरे संबंधों को दर्शाते हैं, जो समय के साथ आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं।

https://hindi.news18.com/news/lifestyle/tips-and-tricks-signs-of-arrival-and-go-back-of-monsoon-without-technology-know-this-old-trick-local18-10867875.html