भारत सरकार के संकटमोचक राम-लक्ष्मण: जानिए अजीत डोभाल और एस जयशंकर की शिक्षा और करियर का सफर

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर को भारत का राम-लक्ष्मण माना जाता है, जो किसी भी बड़े संकट के समय हिमालय की तरह अडिग खड़े रहते हैं। इस लेख में जानिए इन दोनों दिग्गज रणनीतिकारों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि और उनके शानदार करियर के बारे में विस्तार से।

देश के दो सबसे भरोसेमंद स्तंभ

जब भी भारत के सामने कोई कठिन कूटनीतिक चुनौती आती है या राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई गंभीर मसला पैदा होता है, तो पूरा देश उम्मीद भरी निगाहों से दो चेहरों की तरफ देखता है। ये दो दिग्गज कोई और नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर हैं। इन दोनों की जोड़ी को कई बार भारत के राम-लक्ष्मण के रूप में भी संबोधित किया जाता है। हाल ही में BRICS समिट के आयोजन से ठीक पहले एनएसए अजीत डोभाल की चीन यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करना था, ताकि आगामी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बिना किसी व्यवधान के संपन्न हो सके। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ये दोनों रणनीतिकार न केवल देशहित को सर्वोपरि रखते हैं, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली एक सोची-समझी सटीक स्ट्रैटेजी का बेहतरीन उदाहरण है। जहाँ अजीत डोभाल अपनी खुफिया कार्यकुशलता और दुश्मनों की चालों को नाकाम करने के लिए जाने जाते हैं, वहीं एस जयशंकर वैश्विक मंचों पर भारत का पक्ष रखने और कूटनीति के पेंच सुलझाने में माहिर हैं।

संकट के समय ढाल बनकर खड़े होने वाले रणनीतिकार

राष्ट्रीय स्तर पर जब भी कोई बड़ा संकट उत्पन्न होता है, तो अजीत डोभाल और एस जयशंकर एक ढाल की तरह सामने आते हैं। इन दोनों का तालमेल ऐसा है कि सुरक्षा और कूटनीति का पहिया एक साथ घूमता रहता है। जहां एस जयशंकर दुनिया के सामने भारत की विदेश नीति को स्पष्ट और सशक्त तरीके से रखते हैं, वहीं अजीत डोभाल पर्दे के पीछे रहकर देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाते हैं। उनकी यही कार्यशैली उन्हें सरकार के सबसे भरोसेमंद सिपाहियों की श्रेणी में रखती है।

भारत के जेम्स बॉन्ड अजीत डोभाल का सफर

अजीत डोभाल को अक्सर 'भारत का जेम्स बॉन्ड' कहा जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में वे देश की सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अजमेर के मिलिट्री स्कूल से हुई, जिसे उस समय किंग जॉर्ज रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल के नाम से जाना जाता था। अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 1967 में आगरा विश्वविद्यालय, जिसे अब डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के नाम से पहचाना जाता है, वहां से इकोनॉमिक्स में एमए की डिग्री प्राप्त की। वे अपनी कक्षा में मेधावी छात्र थे और टॉपर रहे थे। पढ़ाई पूरी करने के अगले ही साल यानी 1968 में उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा पास की और केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी के रूप में अपनी सेवा शुरू की।

खुफिया एजेंसी रॉ में विशेष योगदान

वर्ष 1972 में अजीत डोभाल देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी रॉ और इंटेलिजेंस ब्यूरो के साथ जुड़ गए। उनके करियर का सबसे चुनौतीपूर्ण और साहसी हिस्सा उनका अंडरकवर एजेंट के रूप में किया गया काम था। उन्होंने वर्षों तक अत्यंत जोखिम भरे ऑपरेशनों को अंजाम दिया, जिसके कारण उन्हें 'भारत के जेम्स बॉन्ड' की उपाधि मिली। वर्ष 2004 से 2005 तक वे इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक के पद पर रहे। इसके बाद मई 2014 में उन्हें देश का पांचवां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया, और तब से वे लगातार भारत की सुरक्षा की बागडोर संभाले हुए हैं।

कूटनीति के माहिर खिलाड़ी डॉ. एस जयशंकर

भारत के विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर का शैक्षणिक और राजनयिक अनुभव बहुत ही व्यापक रहा है। उनकी स्कूली शिक्षा नई दिल्ली के एयर फोर्स स्कूल से संपन्न हुई। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से केमिस्ट्री में बीएससी की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का रुख किया और वहां से राजनीति विज्ञान में एमए, एमफिल के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में पीएचडी हासिल की।

आईएफएस अधिकारी से विदेश मंत्री तक का सफर

डॉ. जयशंकर ने वर्ष 1977 में भारतीय विदेश सेवा में अपना करियर शुरू किया। चार दशकों से अधिक समय तक उन्होंने एक कुशल राजनयिक के तौर पर देश को अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने वर्ष 2007 से 2009 तक सिंगापुर में भारत के उच्चायुक्त के रूप में कार्य किया। इसके अलावा वे चेक गणराज्य, चीन (2009-2013) और अमेरिका (2013-2015) में भारत के राजदूत भी रहे। जनवरी 2015 से जनवरी 2018 तक उन्होंने विदेश सचिव के रूप में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः मई 2019 में उन्हें भारत का विदेश मंत्री बनाया गया। वे वर्तमान में गुजरात से राज्यसभा सांसद के रूप में देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

किसी भी दबाव के आगे न झुकने की नीति

अजीत डोभाल और एस जयशंकर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे कभी नहीं झुकते। चाहे बात आतंकवाद से सख्ती से निपटने की हो या पश्चिमी देशों की आंखों में आंखें डालकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर अडिग रहने की, इन दोनों ने बार-बार यह साबित किया है कि एक मजबूत और दृढ़ संकल्प वाली लीडरशिप देश को सफलता के नए शिखर पर ले जा सकती है। यही कारण है कि देश की जनता और सरकार का भरोसा इन दोनों दिग्गजों पर लगातार बना हुआ है। जब भी कोई राष्ट्रीय संकट सामने आता है, ये दोनों अनुभवी रणनीतिकार बिना विचलित हुए भारत के हितों की रक्षा करने में जुट जाते हैं।

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