पितृपक्ष 2026: पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का 16 दिवसीय अनुष्ठान
पितृपक्ष का पवित्र समय आज यानी 27 सितंबर 2026 से शुरू हो गया है। यह वह अवधि है जब हिंदू धर्म को मानने वाले लोग अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और उनकी शांति के लिए तर्पण, दान और श्राद्ध कर्म संपन्न करते हैं। यह 16 दिनों तक चलने वाला एक विशेष काल है, जो अपने पूर्वजों को याद करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है। इस वर्ष पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इन दिनों देशभर से श्रद्धालु अपनी परंपराओं का निर्वहन करने के लिए गंगा के तट पर पहुंचते हैं।
हरिद्वार की नारायणी शिला और उसका आध्यात्मिक महत्व
गंगा की पावन नगरी हरिद्वार में स्थित नारायणी शिला को पितरों की मुक्ति का प्रमुख द्वार माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गयाजी के बाद पिंडदान और श्राद्ध कर्म के लिए इसे देश का सर्वोच्च तीर्थ स्थल माना गया है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। पुराणों के अनुसार, यह शिला साक्षात भगवान विष्णु के श्रीविग्रह का हृदय स्थल यानी कमलासन मानी जाती है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु यहां आकर अपने पूर्वजों के नाम का पिंडदान करते हैं, उनकी प्रार्थना सीधे भगवान विष्णु तक पहुंचती है, जिससे पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि हर साल पितृपक्ष के दौरान यहां देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपने पितरों के स्मरण के लिए जुटते हैं।
नारायणी शिला से जुड़ी पौराणिक कथा
नारायणी शिला की स्थापना के पीछे एक बहुत ही रोचक और पौराणिक कथा वायु पुराण और स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित है। कथा के अनुसार, गयासुर नामक असुर ने जब नारदजी से अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा, तो उन्हें कठिन तपस्या या भगवान के हाथों मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताया गया। असुर वृत्ति के कारण, गयासुर बद्रीधाम पहुंचा, लेकिन वहां मंदिर के कपाट बंद होने पर वह क्रोधित हो गया और भगवान के कमलासन को ही उठाकर ले जाने का प्रयास करने लगा।
इस घटना के बाद भगवान विष्णु ने केस-लोचन तीर्थ में गयासुर को रोका। दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान भगवान विष्णु ने अपनी गदा से प्रहार किया, जिसे रोकने के लिए गयासुर ने भगवान के ही कमलासन को ढाल की तरह इस्तेमाल किया। इस संघर्ष में वह दिव्य कमलासन तीन हिस्सों में विभाजित होकर टूट गया। मान्यता है कि उसका एक भाग हरिद्वार में गिरा, जहां आज नारायणी शिला मंदिर स्थित है। दूसरा हिस्सा बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल में और तीसरा भाग गयाजी में जाकर गिरा। इसीलिए ये तीनों स्थान आज भी पिंडदान के लिए सबसे पवित्र माने जाते हैं।
पितृपक्ष 2026: तिथियों का गणित और श्राद्ध की प्रक्रिया
वर्ष 2026 में पितृपक्ष की अवधि 27 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर दिन शनिवार तक रहेगी। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस वर्ष 15 दिनों के भीतर 16 श्राद्ध कर्म किए जाएंगे। इसका मुख्य कारण तिथियों का क्षय होना है, जिसके चलते 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। श्राद्ध कर्म करने के लिए शास्त्रों में कुछ नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करना आवश्यक माना जाता है:
- श्राद्ध मुख्य रूप से दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
- जो लोग अपने पितरों की सही मृत्यु तिथि के बारे में जानकारी नहीं रखते हैं, वे सर्वपितृ अमावस्या के दिन तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं।
- पितृपक्ष में सात्विक भोजन और संयम का पालन करना चाहिए।
- गंगा जैसे पवित्र नदियों के तट पर पिंडदान करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलने की मान्यता है।
गंगा के पावन तट पर स्थित यह प्राचीन तीर्थ स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह वह स्थान भी है जहां श्रद्धालु अपने अतीत को याद करते हुए आने वाले कल के लिए सुख और शांति की कामना करते हैं। पितृपक्ष का यह समय हमें हमारे पूर्वजों से जोड़े रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
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