चीन की व्यापारिक चालाकी का खुलासा, भारत का सामान वियतनाम के रास्ते मंगा रहा है ड्रैगन

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने खुलासा किया है कि चीन भारत से भारी मात्रा में भैंसे का मांस और दवाएं खरीदता है, लेकिन इसे सीधे न मंगाकर वियतनाम जैसे देशों के जरिए मंगवाता है जिससे ये आंकड़े भारत के निर्यात खाते में नहीं जुड़ पाते।

चीन के साथ व्यापारिक संबंधों का छिपा सच

भारत और चीन के बीच होने वाले व्यापार के आंकड़ों को लेकर अक्सर यह बहस होती है कि भारत चीन को बहुत कम निर्यात करता है जबकि उससे आयात बहुत ज्यादा होता है। पिछले वित्तवर्ष की बात करें तो भारत को चीन के साथ करीब 90 अरब डॉलर का भारी-भरकम व्यापार घाटा झेलना पड़ा था। आंकड़ों की इस तस्वीर से ऐसा लगता है कि चीन में भारतीय वस्तुओं की मांग कम है, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। देश की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अब इस व्यापारिक समीकरण की हकीकत पर से पर्दा उठा दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि चीन वास्तव में भारत से बहुत बड़ी मात्रा में सामान खरीदता है, लेकिन वह इसे सीधे आयात करने के बजाय अन्य देशों के माध्यम से मंगवाता है। इसी कारण से ये आंकड़े आधिकारिक रूप से भारत के कुल निर्यात खाते में दर्ज नहीं हो पाते हैं।

वियतनाम के रास्ते चीन पहुंच रहा भारतीय सामान

वित्तमंत्री ने बताया कि भारत के निर्यात के जो आंकड़े आधिकारिक रूप से सामने आते हैं, वे पूरी सच्चाई नहीं दिखाते। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भैंसे का मांस और जेनेरिक दवाएं ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें चीन भारी मात्रा में भारत से खरीदता है। हालांकि, चीन इन वस्तुओं को सीधे भारत से लेने के बजाय वियतनाम जैसे देशों के रास्ते अपने बाजार में मंगवाता है। इस तरह की व्यापारिक रणनीति के कारण भारत के निर्यात के आंकड़ों में ये चीजें शामिल नहीं हो पाती हैं। सीतारमण ने कहा कि तकनीकी रूप से इसे भारत का ही निर्यात माना जाना चाहिए क्योंकि वस्तु का मूल स्रोत भारत ही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह एक ऐसी कूटनीतिक हकीकत है जिसे स्वीकार करना जरूरी है, भले ही यह बात कूटनीति के लिहाज से थोड़ी असहज लग सकती हो। भारत को उन उत्पादों के लिए चीन के बाजार में पर्याप्त पहुंच नहीं मिल रही है जो मात्रा और मूल्य दोनों ही दृष्टिकोण से बड़े व्यापारिक महत्व रखते हैं।

विनिर्माण को बढ़ावा और आत्मनिर्भरता पर जोर

केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं पर बात करते हुए वित्तमंत्री ने कहा कि सरकार देश में विनिर्माण यानी मैन्युफैक्चरिंग को तेज करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। सरकार का मुख्य उद्देश्य अन्य देशों पर निर्भरता को कम करना है। इसके लिए उद्योगों को आम बजट के माध्यम से विशेष समर्थन और प्रोत्साहन प्रदान किया जा रहा है। उन व्यवसायों और उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है जो आयात पर निर्भर रहने के बजाय देश के भीतर ही उत्पादन बढ़ाने के लिए कदम उठा रहे हैं। यह रणनीति न केवल घरेलू उत्पादन को मजबूती देगी बल्कि विदेशी निर्भरता को भी कम करेगी।

कल्याणकारी योजनाओं पर सफाई

वित्तमंत्री ने देश की कल्याणकारी योजनाओं को 'मुफ्त की रेवड़ी' कहे जाने के दावों को भी सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार की प्रत्येक योजना एक सोची-समझी रणनीति और विस्तृत योजना के साथ लागू की जाती है। यदि किसी योजना के लिए बजट में प्रावधान किया गया है, तो वह पूरी तरह से वित्तीय रूप से टिकाऊ होती है। उन्होंने कहा कि इन जनकल्याणकारी कार्यों को सनसनीखेज तरीके से पेश करने के बजाय गंभीरता से समझने की जरूरत है।

यूपीआई और एमडीआर को लेकर स्पष्टीकरण

डिजिटल भुगतान और यूपीआई के भविष्य पर उठ रही चिंताओं को दूर करते हुए वित्तमंत्री ने मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR को लेकर अहम बात कही। उन्होंने साफ किया कि प्रस्तावित एमडीआर कोई कर, उपकर या अधिभार नहीं है। यह राशि सरकारी खजाने में नहीं जाती है। यह शुल्क केवल व्यापारियों और भुगतान सुविधा देने वाली संस्थाओं के बीच का मामला है। सीतारमण ने स्पष्ट किया कि इसका बोझ किसी भी स्थिति में आम उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा, जिससे डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता रहेगा।

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