बैंकों को दिए गए लोन की वसूली (रिकवरी) के असीमित अधिकारों पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए मृतक व्यक्ति की पत्नी के खाते से काटी गई भारी-भरकम राशि को तुरंत वापस करने का निर्देश दिया है। यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले का है, जहां एक प्राथमिक विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर कार्यरत अंबेश कुमार ने SBI से पर्सनल लोन लिया था। दुर्भाग्यवश, पिछले साल जून में एक दर्दनाक सड़क हादसे में अंबेश की मौत हो गई थी, जिसके बाद बैंक ने उनके लोन की भरपाई के लिए एक ऐसा कदम उठाया जिसे अदालत ने प्रथम दृष्टया अनुचित माना है।
विधवा के खाते से बैंक ने काटे 17,29,999 रुपये
कानूनी समाचार वेबसाइट 'लाइव लॉ' के अनुसार, कर्जदार अंबेश कुमार की मृत्यु के बाद SBI ने उनके द्वारा लिए गए पर्सनल लोन की बकाया राशि वसूलने के लिए उनकी विधवा पत्नी के बैंक खाते से सीधे 17,29,999 रुपये काट लिए। दरअसल, अंबेश कुमार ने एक जीवन बीमा (लाइफ इंश्योरेंस) पॉलिसी ले रखी थी, जिसके क्लेम के रूप में उनकी पत्नी के खाते में 50 लाख रुपये की राशि आई थी। जैसे ही यह रकम खाते में जमा हुई, बैंक ने बिना कोई देरी किए उसमें से करीब साढ़े सत्रह लाख रुपये की कटौती कर ली।
पति की असमय मृत्यु के सदमे से जूझ रही पत्नी ने बैंक की इस एकतरफा कार्रवाई को अदालत में चुनौती दी। याचिकाकर्ता महिला की दलील थी कि उन्होंने बैंक से कोई व्यक्तिगत कर्ज नहीं लिया था और न ही वे अपने पति के उस लोन के लिए किसी भी तरह से गारंटर (जामिनदार) थीं। ऐसे में बैंक के पास उनकी सहमति के बिना उनके निजी खाते से पैसे काटने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
बीमा राशि मृतक की संपत्ति नहीं: हाई कोर्ट
इस संवेदनशील और तकनीकी मामले की सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने की। मामले के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के बाद माननीय उच्च न्यायालय ने बैंक की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यद्यपि बैंक के लोन एग्रीमेंट का क्लॉज 18(iii) काफी व्यापक तरीके से लिखा गया है, लेकिन पहली नजर में यह बैंक को विधवा को मिले जीवन बीमा के पैसे से उसके मृतक पति के कर्ज की वसूली का अधिकार कतई नहीं देता है।
अदालत ने बहुत ही महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया कि:
- महिला को मिला जीवन बीमा का पैसा मृतक की संपत्ति (एस्टेट) का हिस्सा नहीं होता है।
- यह राशि सीधे तौर पर नामित लाभार्थी की निजी संपत्ति होती है।
- बीमा क्लेम की धनराशि मृतक द्वारा अपने परिवार के लिए पीछे छोड़ा गया एक सामाजिक सुरक्षा उपाय या वित्तीय लाभ है, जिसे लाभार्थी अपनी स्वतंत्र हैसियत में प्राप्त करता है।
इस महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या के साथ हाई कोर्ट ने बैंक को पैसे वापस करने का आदेश दिया है और इस मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर, 2026 को तय की है।
आखिर क्या है लोन एग्रीमेंट का क्लॉज 18(iii)?
सामान्य तौर पर जब भी कोई व्यक्ति किसी बैंक से लोन लेता है, तो समझौते के तहत कई तरह के नियमों पर सहमति देनी होती है। इसी में से एक नियम लोन एग्रीमेंट का क्लॉज 18(iii) होता है। यह क्लॉज बैंकों को वित्तीय भाषा में 'सेट-ऑफ' यानी खातों के समायोजन का एक बेहद शक्तिशाली अधिकार प्रदान करता है। यह नियम मुख्यतः लोन डिफॉल्ट होने की स्थिति में लागू होता है।
इसके तहत नियम इस प्रकार काम करते हैं:
- ऋण लेने वाला व्यक्ति (उधारकर्ता) बैंक को बिना किसी शर्त के यह पूर्ण अधिकार और सहमति प्रदान करता है कि बैंक अपने बकाये की वसूली कर सके।
- यदि कर्जदार अपने लोन की किस्त, ब्याज या पेनल्टी का भुगतान समय पर नहीं कर पाता है, तो बैंक को यह अधिकार मिल जाता है कि वह उसके किसी भी अन्य खाते जैसे- बचत खाता (सेविंग्स अकाउंट), रिकरिंग डिपॉजिट (RD) या फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जमा पैसों को बिना किसी पूर्व सूचना के आपस में एडजस्ट कर सकता है।
हालांकि, वर्तमान मामले में पेंच यह फंसा कि बैंक ने कर्जदार की मृत्यु के बाद, उसकी पत्नी के खाते में आए पैसे को सेट-ऑफ करने की कोशिश की, जिस पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।
https://www.indiatv.in/paisa/personal-finance/husband-died-after-taking-a-loan-bank-deducted-rs-17-30-lakh-from-wife-s-account-matter-reaches-court-2026-09-26-1245472