जहानाबाद के दो भाइयों की अनोखी कामयाबी: 1971 में 3 रुपये किलो दूध बेचने से की थी शुरुआत, आज 32 पशुओं से हर महीने कमा रहे 1 लाख से अधिक

बिहार के जहानाबाद में दो भाइयों ने मात्र 2 पशुओं से डेयरी फार्मिंग की शुरुआत की थी। आज उनके पास 32 उन्नत नस्ल के पशु हैं और वे हर महीने बंपर मुनाफा कमा रहे हैं।

बिहार में इन दिनों पारंपरिक खेती के साथ-साथ पशुपालन का चलन तेजी से बढ़ रहा है। केवल गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों और कस्बों में भी लोग बड़े पैमाने पर गाय और भैंस पालन के व्यवसाय से जुड़ रहे हैं। इससे न केवल दूध की बिक्री से अच्छी आमदनी हो रही है, बल्कि गोबर की बिक्री और खाद निर्माण से भी अतिरिक्त कमाई का जरिया बन रहा है। बिहार के जहानाबाद जिले में एक ऐसा ही अनूठा उदाहरण सामने आया है, जहां दो भाइयों ने मिलकर डेयरी फार्मिंग के क्षेत्र में अपनी किस्मत बदली और आज वे इलाके के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं। यह कहानी जहानाबाद के घोषी प्रखंड के अंतर्गत आने वाले ज्ञानगढ़ मठ के रहने वाले दो भाइयों, कपिल देव यादव और बीरेंद्र यादव की है।

महज दो पशुओं से शुरू हुआ था यह ऐतिहासिक सफर

बात साल 1971 की है, जब कपिल देव यादव ने अपनी 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। परीक्षा पास करने के बाद वे अपनी आजीविका चलाने के लिए काम की तलाश में थे। इसी दौरान उन्होंने अपने गांव में ही रहकर एक निजी विद्यालय का संचालन शुरू किया। हालांकि, इस स्कूल से उन्हें उतनी आमदनी नहीं हो पा रही थी जिससे परिवार की आर्थिक जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें। दूसरी तरफ, उनके भाई बीरेंद्र यादव का ध्यान शुरू से ही खेती-किसानी और पशुपालन पर था। बीरेंद्र यादव ने मन में ठान लिया था कि उन्हें पशुपालन के क्षेत्र में ही आगे बढ़ना है। उस समय उनके पास बहुत अधिक पूंजी नहीं थी, जिसके कारण उन्होंने बेहद सीमित संसाधनों के साथ इस काम की शुरुआत की। वे बाजार से कम कीमत पर केवल 2 पशु खरीदकर घर लाए और ज्ञानगढ़ मठ में पशुपालन का काम शुरू कर दिया।

जब दोनों भाइयों ने मिलाए हाथ और बदल गई किस्मत

कपिल देव यादव काफी समय तक स्कूल चलाते रहे, लेकिन जब वहां बहुत अधिक कामयाबी नहीं मिली और आर्थिक तंगी बनी रही, तो उनका मन इस काम से हटने लगा। ऐसे में दोनों भाइयों ने मिलकर एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे अलग-अलग राह पर चलने के बजाय एक साथ मिलकर पशुपालन के इस पारंपरिक व्यवसाय को ही बड़े स्तर पर आगे बढ़ाएंगे। जब उन्होंने काम शुरू किया, तब बाजार में दूध की कीमत बहुत कम थी। उन्होंने महज 3 रुपये प्रति किलो की दर से दूध बेचना शुरू किया था। शुरुआती दौर में मुश्किलें काफी थीं, लेकिन दोनों भाइयों ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने दिन-रात मेहनत की, पशुओं की देखभाल की और समय-समय पर सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का भी भरपूर लाभ उठाया। सरकारी मदद और अपनी मेहनत के बल पर धीरे-धीरे उनके फार्म में पशुओं की संख्या बढ़ने लगी। जो सफर कभी सिर्फ 2 गायों से शुरू हुआ था, वह आज बढ़ते-बढ़ते 32 पशुओं के विशाल कुनबे में तब्दील हो चुका है।

50 हजार रुपये का खर्च और 1 लाख रुपये से ज्यादा का मुनाफा

कपिल देव यादव अपनी इस सफलता पर गर्व करते हुए बताते हैं कि उनके डेयरी फार्म में आज उन्नत नस्ल के पशु मौजूद हैं। उनके पास गाय और भैंस दोनों ही तरह के दुधारू पशु हैं। इनके डेयरी फार्म में निम्नलिखित मुख्य नस्लें शामिल हैं:

  • साहीवाल
  • मुर्रा
  • जर्सी
  • गिर

पशुओं के खान-पान, चारे, डॉक्टर की फीस और अन्य रखरखाव पर दोनों भाई हर महीने लगभग 50,000 रुपये खर्च करते हैं। इस खर्च को निकालने के बाद उन्हें हर महीने 1,10,000 रुपये से लेकर 1,15,000 रुपये तक की शानदार शुद्ध कमाई हो जाती है। इस व्यवसाय से हुई कमाई की बदौलत उन्होंने न केवल अपना एक पक्का और सुंदर घर बनवाया, बल्कि परिवार में बच्चों की शादी-ब्याह से लेकर अन्य सभी सामाजिक और मांगलिक कार्यों को भी बेहद सम्मानजनक तरीके से संपन्न किया। आज भी उनका पूरा परिवार इसी व्यवसाय से बहुत ही खुशहाल जीवन जी रहा है।

बेरोजगार युवाओं के लिए एक प्रेरणादायक संदेश

आज के समय में जब देश के युवा सरकारी नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं या शहरों में छोटी-मोटी नौकरियों के लिए भटक रहे हैं, तब कपिल देव और बीरेंद्र यादव की यह सफलता की कहानी एक नया रास्ता दिखाती है। कपिल देव यादव युवाओं को संदेश देते हुए कहते हैं कि किसी को भी घर पर बेकार नहीं बैठना चाहिए। नौकरी न मिलने पर हताश होने के बजाय स्वरोजगार के अवसरों को तलाशना चाहिए। अगर आप लगन और कड़ी मेहनत के साथ कोई भी काम शुरू करते हैं, तो सफलता निश्चित रूप से आपके कदम चूमेगी। पशुपालन एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें कभी मंदी नहीं आती और अगर इसे वैज्ञानिक व आधुनिक तरीके से किया जाए, तो यह बेहद लाभदायक साबित हो सकता है।

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