गुजरात पुलिस भर्ती: ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए अलग जेंडर श्रेणी की मांग, हाईकोर्ट ने सरकार को भेजा नोटिस

गुजरात पुलिस भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग श्रेणी बनाने और आरक्षण की मांग को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने राज्य के गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी किया है।

ट्रांसजेंडर अभ्यर्थी की कोर्ट में गुहार

गुजरात पुलिस की चल रही भर्ती प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक अलग जेंडर श्रेणी (थर्ड जेंडर कैटेगरी) बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। इस मामले को लेकर गुजरात हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य के गृह विभाग और पुलिस महानिदेशक (DGP) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने अधिकारियों को 29 सितंबर तक इस याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

आवेदन के दौरान उलझन और प्रक्रिया

याचिकाकर्ता एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति है जिसने एडवोकेट हन्नान कुरैशी के माध्यम से यह कानूनी लड़ाई शुरू की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, अभ्यर्थी ने पुलिस विभाग में अनआर्म्ड कांस्टेबल और पुलिस सब-इंस्पेक्टर (PSI) के पदों के लिए आवेदन किया था। आवेदन प्रक्रिया के दौरान जब उसने स्पष्टीकरण के लिए डीजीपी कार्यालय से संपर्क किया कि उसे किस श्रेणी में फॉर्म भरना चाहिए, तो उसे आधार कार्ड में दर्ज जेंडर का उपयोग करने की सलाह दी गई। चूँकि आधार कार्ड में महिला जेंडर अंकित था, इसलिए उसने महिला श्रेणी में अपना आवेदन जमा किया।

परीक्षण में सफलता और मेरिट का गणित

याचिकाकर्ता ने महिला श्रेणी के तहत ही शारीरिक मानक परीक्षा (PST) और शारीरिक दक्षता परीक्षा (PET) को सफलतापूर्वक पूरा किया। इसके बाद आयोजित लिखित परीक्षा में उसे 94 अंक प्राप्त हुए। हालांकि, जब एसईबीसी महिला श्रेणी का कट-ऑफ 98.5 अंक निर्धारित किया गया, तो अभ्यर्थी मेरिट में पीछे रह गया। 11 जुलाई को जब मेरिट सूची जारी की गई, तो याचिकाकर्ता ने अधिकारियों के समक्ष यह पक्ष रखा कि उसे पुरुष या महिला नहीं, बल्कि तीसरी जेंडर श्रेणी (ट्रांसजेंडर) के अंतर्गत माना जाना चाहिए। अपनी बात न सुने जाने पर उसने अंततः हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

याचिका में उठाए गए प्रमुख तर्क

याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध एनएएलएसए (NALSA) फैसले का हवाला दिया है और निम्नलिखित प्रमुख मांगे रखी हैं:

  • ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए संविधान के अनुरूप अलग कट-ऑफ और चयन मानदंड लागू किए जाएं।
  • तीसरी श्रेणी के लिए अलग से आरक्षण या कोटा निर्धारित किया जाए।
  • भर्ती प्रक्रिया में तीसरी श्रेणी को शामिल न करना संविधान के अनुच्छेद 14 का सीधा उल्लंघन है।
  • भर्ती अधिकारियों पर लिंग के आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाया गया है।

याचिका में कहा गया है कि देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक कलंक और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, इसलिए अन्य श्रेणियों की तुलना में उन्हें विशेष आरक्षण की सख्त आवश्यकता है।

कोर्ट का रुख और आगे की राह

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि उसे 30 सितंबर को होने वाली आगामी दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया में तीसरी जेंडर श्रेणी के अभ्यर्थी के रूप में भाग लेने की अनुमति दी जाए। कोर्ट में सुनवाई के दौरान अन्य राज्यों में ट्रांसजेंडर अभ्यर्थियों के लिए अपनाई जा रही नीतियों का उदाहरण भी पेश किया गया। मामले की गंभीरता को देखते हुए जस्टिस अनिरुद्ध मायी ने अधिकारियों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। अब सभी की निगाहें 29 सितंबर पर टिकी हैं, जब इस मामले में सरकार की ओर से आधिकारिक रुख स्पष्ट किया जाएगा।

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