ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात: क्या चीन राष्ट्रपति को थमाएंगे एक खाली डब्बा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 25 सितंबर को होने वाली हाई-प्रोफाइल बैठक से किसी बड़े समझौते की उम्मीद कम है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि चीन इस मीटिंग में केवल दिखावटी वादे करेगा और कोई ठोस आर्थिक राहत नहीं देगा।

बैठक के पीछे की कड़वी सच्चाई

दुनिया की दो महाशक्तियां जब भी आमने-सामने होती हैं, तो वैश्विक पटल पर हलचल तेज हो जाती है। इस बार 25 सितंबर को होने वाली डोनल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। लोग कयास लगा रहे हैं कि शायद यह बैठक महीनों से चले आ रहे ट्रेड वॉर को खत्म कर देगी या कोई ऐतिहासिक करार देखने को मिलेगा। हालांकि, जमीनी हकीकत इन उम्मीदों से काफी दूर है। राजनीति और कूटनीति के जानकारों का मानना है कि इस मुलाकात में शी जिनपिंग अपने अमेरिकी समकक्ष को एक खाली डब्बा थमाने की तैयारी में हैं। यानी बाहर से तो बड़ी-बड़ी बातें होंगी, लेकिन ट्रंप को हासिल कुछ ठोस नहीं होगा।

आठ घंटे की मैराथन वार्ता का फीका नतीजा

हाल ही में न्यूयॉर्क में दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बीच आठ घंटे तक लंबी बातचीत हुई थी। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीनी प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई इस बैठक को लेकर काफी उत्साह दिखाया गया था। बैठक के बाद स्कॉट बेसेंट ने व्यापार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI जैसे विषयों पर बहुत सफल चर्चा होने का दावा किया था। लेकिन अगर बारीकी से विश्लेषण किया जाए, तो आठ घंटे की इस लंबी कवायद का नतीजा शून्य रहा है। दोनों पक्षों ने केवल एक सिस्टम या बोर्ड बनाने की रजामंदी दी है, जो भविष्य में बिजनेस डील्स और कम टैरिफ वाले सामानों की पहचान करेगा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि ट्रेड वॉर, ताइवान विवाद और मिडिल ईस्ट में जारी जंग जैसे गंभीर विषयों पर कोई भी चर्चा नतीजा नहीं दे सकी। जब अधिकारी स्तर पर कोई बड़ा निर्णय नहीं लिया जा सका, तो अब सारा दबाव ट्रंप और शी जिनपिंग के कंधों पर आ गया है।

ट्रंप के सुर नरम क्यों पड़ गए

कुछ समय पहले तक डोनल्ड ट्रंप चीन पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने का आरोप लगा रहे थे। उन्होंने चीनी उत्पादों पर 145 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाकर चीन को घुटनों पर लाने का प्रयास किया था। उस समय ट्रंप की आक्रामक नीति से लग रहा था कि वे चीन को पूरी तरह शिकस्त देंगे। लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। हाल के दिनों में ट्रंप के बयानों में नरमी देखी जा रही है। उन्होंने स्वीकार किया है कि चीन के साथ उनके संबंध काफी बेहतर हैं और 145 प्रतिशत टैरिफ बहुत अधिक था, जिसका बुरा असर चीन के साथ-साथ अमेरिका पर भी पड़ रहा था। ट्रंप का यह यू-टर्न यह संकेत देता है कि उनका ट्रेड वॉर अब अपनी सीमाओं तक पहुंच चुका है। वे समझ गए हैं कि चीन पर अत्यधिक दबाव डालना उनके अपने देश के व्यापार के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहा है।

एक ट्रिलियन डॉलर का जादुई आंकड़ा

शी जिनपिंग इस बार बातचीत की मेज पर ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं। इसका सबसे बड़ा कारण चीन का ग्लोबल ट्रेड सरप्लस है, जो 1 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि चीन पूरी दुनिया को जितना सामान बेच रहा है, वह उसके द्वारा खरीदे जाने वाले सामान की तुलना में 1 ट्रिलियन डॉलर अधिक है। ट्रंप के टैरिफ और तमाम आर्थिक प्रतिबंधों के बावजूद चीनी निर्यात में कोई बड़ी गिरावट नहीं देखी गई है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन अमेरिका को लगभग 6,500 अलग-अलग श्रेणियों में सामान सप्लाई करता है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस साल भी इनमें से आधे से अधिक श्रेणियों में चीन की बिक्री कम होने के बजाय और बढ़ गई है। जब अमेरिका का चीन पर निर्भरता कम नहीं हो रही, तो शी जिनपिंग को किसी भी बड़ी हड़बड़ी में समझौता करने की आवश्यकता नहीं है।

ताइवान और 14 अरब डॉलर का हथियार सौदा

इस शिखर सम्मेलन का सबसे संवेदनशील बिंदु ताइवान का मुद्दा है। अमेरिका ने ताइवान को 14 अरब डॉलर का हथियार पैकेज देने की योजना बनाई है, जिसमें एंटी-ड्रोन तकनीक, आधुनिक मिसाइलें और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। ट्रंप को इस डील पर अंतिम हस्ताक्षर करने हैं। शी जिनपिंग निश्चित रूप से ट्रंप पर यह दबाव बनाएंगे कि वे इस हथियार सौदे को तुरंत फ्रीज कर दें। ऐसी पूरी संभावना है कि ट्रंप इस मांग को मान लेंगे, क्योंकि वे वैश्विक दबावों और मिडिल ईस्ट की अस्थिरता के बीच चीन के साथ कोई नया विवाद खड़ा नहीं करना चाहते।

तकनीकी मोर्चे पर गतिरोध

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक के मामले में भी कोई बड़े समझौते की उम्मीद नहीं है। ट्रंप स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका तकनीकी विकास की गति को कम नहीं करेगा। जब अमेरिका पीछे हटने को तैयार नहीं है, तो चीन के लिए भी अपनी रफ्तार कम करने का कोई कारण नहीं है। एआई पर अगर कोई सहमति बनती भी है, तो वह केवल नाममात्र की होगी। कोई भी देश अपनी तकनीकी बढ़त को दांव पर नहीं लगाना चाहता।

विवाद का समाधान नहीं, केवल प्रबंधन

कुल मिलाकर, 25 सितंबर की यह बैठक किसी ऐतिहासिक घटना की गवाह नहीं बनने वाली है। यह शिखर सम्मेलन मतभेदों को मिटाने के बजाय उन्हें मैनेज करने का एक प्रयास मात्र है। शी जिनपिंग ट्रंप को चमकदार शब्दों और बड़ी घोषणाओं के साथ एक खाली डब्बा देंगे। इसमें दिखावा तो बहुत होगा, लेकिन ट्रंप के हाथ में ठोस समाधान शायद ही आ पाएगा। दोनों देश एक-दूसरे की जरूरतों को समझते हुए अपनी-अपनी रणनीतियों को बनाए रखने की कोशिश करेंगे।

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