माता-पिता की याद में शुरू किया नेक काम
झारखंड की राजधानी रांची की निवासी मीना सिंह ने एक ऐसी मिसाल कायम की है जो न केवल व्यापारिक दृष्टि से सफल है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से भी भरी हुई है। मीना ने अपने माता-पिता के निधन के बाद उनकी यादों को संजोने के लिए 'जग बुनकर' नाम से एक ब्रांड की शुरुआत की। वे बताती हैं कि उनके जीवन पर उनके माता-पिता के चले जाने का गहरा प्रभाव पड़ा था, जिसके चलते उन्होंने उनके नाम को जीवित रखने के लिए इस सामाजिक उपक्रम को अपना रास्ता बनाया। आज उनका यह ब्रांड न केवल साड़ियों और दुपट्टों के व्यापार में सक्रिय है, बल्कि जरूरतमंदों के लिए सहारा भी बना हुआ है।
विभिन्न राज्यों के बुनकरों को मिला बड़ा मंच
मीना सिंह का यह ब्रांड स्थानीय और क्षेत्रीय कलाकारों को एक बड़ा मंच प्रदान कर रहा है। 'जग बुनकर' के माध्यम से वे उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और झारखंड के कुशल बुनकरों से सीधे संपर्क करती हैं और उनसे साड़ियां व दुपट्टे तैयार करवाती हैं। इन उत्पादों की खासियत यह है कि इनमें पारंपरिक हाथ की कारीगरी का अद्भुत नमूना देखने को मिलता है। उदाहरण के तौर पर, ग्राहकों को यहां बंगाल का प्रसिद्ध ब्लॉक प्रिंट, झारखंड का विशेष तसर सिल्क और बिहार का मशहूर भागलपुरी सिल्क आसानी से मिल जाता है। मीना न केवल इन बुनकरों के हुनर को दुनिया के सामने ला रही हैं, बल्कि उन्हें उनके काम का सही और उचित मेहनताना भी सुनिश्चित करती हैं। इस पहल से आज 100 से अधिक बुनकर सीधे तौर पर जुड़ चुके हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
मुनाफे का 100 प्रतिशत हिस्सा दान
इस ब्रांड की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कमाई का वितरण है। मीना सिंह ने स्पष्ट किया है कि उनके इस व्यवसाय से होने वाले मुनाफे का 100 प्रतिशत हिस्सा ओल्ड ऐज होम यानी वृद्धाश्रमों को दान में दे दिया जाता है। वे कहती हैं कि उनके माता-पिता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्हें अपने जीवन में किसी चीज की कमी नहीं है। इसी भावना के साथ वे उन लोगों का ध्यान रखना चाहती हैं जो वृद्धाश्रमों में रह रहे हैं, ताकि वहां रहने वाले बुजुर्गों को किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। इसके अलावा, मीना 10 ऐसे स्कूलों को भी निरंतर सहयोग प्रदान कर रही हैं, जिनमें गरीब परिवारों के बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। व्यवसाय से होने वाली यह कमाई उन बच्चों के लिए एक बड़ी आर्थिक मदद साबित होती है।
चुनौतियों से भरा रहा सफलता तक का सफर
मीना सिंह के लिए आज का यह मुकाम हासिल करना बिल्कुल भी आसान नहीं था। अपने संघर्षों को याद करते हुए वे बताती हैं कि पिता के निधन के बाद उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। उनके बड़े भाई, जो स्वयं शारीरिक रूप से अक्षम (हैंडीकैप) हैं, ने भी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पूरे घर की जिम्मेदारी उठाई और एक पिता की भांति मीना का ख्याल रखा। इन्हीं चुनौतियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच से गुजरते हुए आज मीना ने अपनी पहचान बनाई है। वे मानती हैं कि हालांकि उनके माता-पिता आज उनके साथ नहीं हैं, लेकिन उन्हें पूरा भरोसा है कि वे इस कार्य को देखकर गर्व महसूस करते होंगे।
सामाजिक सरोकार और व्यापार का संतुलन
आज मीना सिंह का ब्रांड 'जग बुनकर' काफी अच्छी कमाई कर रहा है और महीने का मुनाफा लाखों रुपये के आंकड़े को पार कर गया है। इसके बावजूद, व्यावसायिक सफलता का लालच उनके मन में नहीं है। मीना का मानना है कि जीवन में हर कार्य केवल मुनाफा कमाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि कुछ कार्य समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने के लिए भी जरूरी होते हैं। उनका पूरा ध्यान इस बात पर रहता है कि जितना भी लाभ हो, उसे पूरी तरह से नेक कामों में समर्पित किया जाए। वे एक सफल व्यवसायी होने के साथ-साथ समाज के उन दो वर्गों को मजबूती प्रदान कर रही हैं, जिन्हें वास्तव में सहयोग की आवश्यकता है। उनके इस अनूठे प्रयास की सराहना हर तरफ हो रही है और लोगों का सकारात्मक प्रतिसाद उन्हें निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहा है।
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