पर्यावरण संरक्षण के लिए अनोखा जज्बा
जोधपुर के खेजड़ली गांव में आयोजित वार्षिक शहीदी मेले में इस बार एक बेहद खास नजारा देखने को मिला। अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजने वाले बिश्नोई समाज की महिलाएं इस मेले में पूरे उत्साह के साथ शामिल हुईं। खास बात यह रही कि मेले में पहुंची महिलाओं ने एक करोड़ रुपए से भी अधिक मूल्य के सोने और चांदी के आभूषण पहन रखे थे। ये महिलाएं न केवल अपनी परंपराओं का प्रदर्शन कर रही थीं, बल्कि 296 साल पहले खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले 363 शहीदों के प्रति अपना सम्मान भी प्रकट कर रही थीं।
सोने के गहनों से सजी महिलाएं
मेले के दौरान महिलाओं का पहनावा आकर्षण का केंद्र बना रहा। बिश्नोई समाज की गृहिणियों से लेकर व्यावसायिक क्षेत्र में सक्रिय महिलाएं तक, भारी-भरकम सोने के हार, कंगन और झुमके पहनकर कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं। कुछ महिलाओं के आभूषणों की कीमत तो करीब एक करोड़ रुपए तक आंकी गई। इन आभूषणों को धारण कर वे अपनी सामाजिक समृद्धि का परिचय दे रही थीं, साथ ही पर्यावरण बचाने के संदेश को भी मुखर कर रही थीं। उन्होंने शहीदों को नमन करते हुए समाज के सामने प्रकृति और संस्कृति के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया।
दूर-दराज से पहुंचे श्रद्धालु
खेजड़ली मेले का महत्व न केवल जोधपुर तक सीमित है, बल्कि यह राजस्थान के अन्य जिलों और पड़ोसी राज्यों के लिए भी आस्था का बड़ा केंद्र है। मेले में फलोदी, नागौर, बीकानेर, सांचौर, जालोर और पाली जैसे जिलों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। इसके अलावा हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से भी बड़ी तादाद में बिश्नोई समाज के लोग शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए खेजड़ली आए। सुबह से ही श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी रहा, जिससे पूरा इलाका आस्था से ओतप्रोत नजर आया।
हवन और बलिदान की याद
मेले के मुख्य कार्यक्रमों में हवन का आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से नारियल की आहुति दी। हवन के बाद सभी लोग शहीद स्मारक पर पहुंचे और 363 शहीदों की पावन स्मृति में उन्हें नमन किया। यह बलिदान गाथा राजस्थान की माटी का गौरव है, जिसने आज भी पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण की राह दिखाई है।
क्या है 296 साल पुरानी बलिदान की गाथा
आज से 296 साल पहले की घटना इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। तब महाराजा अभय सिंह के शासनकाल में महल बनाने के लिए सैनिकों को खेजड़ी के पेड़ काटने का आदेश मिला था। जब सैनिक खेजड़ली गांव पहुंचे और पेड़ काटने लगे, तो अमृता देवी बिश्नोई ने साहस का परिचय देते हुए इसका पुरजोर विरोध किया। वह स्वयं पेड़ से लिपट गईं और उनसे प्रेरणा लेकर उनकी बेटियां आसू, रत्नी और भागू बाई भी पेड़ों की ढाल बन गईं। धीरे-धीरे पूरा गांव इस आंदोलन में शामिल हो गया। सैनिकों की क्रूर कार्रवाई में 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण त्याग दिए, जिनमें 71 महिलाएं और 292 पुरुष शामिल थे।
पर्यावरण संरक्षण का वैश्विक प्रतीक
इस हृदयविदारक घटना की खबर जब महाराजा अभय सिंह को मिली, तो उन्होंने तत्काल प्रभाव से पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी। साथ ही, बिश्नोई समाज को लिखित रूप में यह आश्वासन दिया कि मारवाड़ क्षेत्र में कभी भी खेजड़ी के पेड़ नहीं काटे जाएंगे। इसी बलिदान की याद में प्रत्येक वर्ष भादवा की दशमी को खेजड़ली में शहीदी मेले का आयोजन किया जाता है। बिश्नोई समाज न केवल पेड़ों की रक्षा के लिए संकल्पित है, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर भी समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। खेजड़ली की शहादत आज भी पर्यावरण को बचाने की सबसे बड़ी मिसाल के रूप में पूरी दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई है।
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