आरक्षित सीटों पर अखिलेश यादव की नजर
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। राज्य की लगभग 21 फीसदी दलित आबादी को अपने पक्ष में करने के लिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बड़ा कदम उठाया है। उन्होंने प्रदेश की आरक्षित विधानसभा सीटों के पदाधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य दलित मतदाताओं तक अपनी पैठ बनाना और चुनावी रणनीति को दुरुस्त करना है। समाजवादी पार्टी का विशेष ध्यान उन 86 आरक्षित सीटों पर है जिनमें से 65 सीटों पर पिछले चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी। अब पार्टी ने एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है जिसके तहत हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 27 हजार अतिरिक्त वोट हासिल करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
अखिलेश यादव का दलित प्रेम और सियासत
अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से लगातार संविधान और दलित समाज से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं। उन्होंने यह गंभीर आरोप लगाया है कि मौजूदा सरकार के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के 72 जिलों के भीतर डॉ. भीमराव अंबेडकर की 151 मूर्तियां क्षतिग्रस्त की गई हैं। पार्टी की योजना दलित समाज के भीतर अपने संगठन को आधार देने की है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश यादव बसपा सुप्रीमो मायावती की पारिवारिक उलझनों और पार्टी की वर्तमान स्थिति का लाभ उठाना चाहते हैं। अपनी इस नई रणनीति के तहत ही सपा छात्र सभा की पोशाक का रंग नीला किया गया है और खुद अखिलेश यादव भी नीला गमछा धारण कर दलित मतदाताओं को एक खास संदेश देने की कोशिश करते दिखे हैं।
बीजेपी का पलटवार और ब्रजेश पाठक का बयान
समाजवादी पार्टी की इस कवायद का जवाब देने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने भी मोर्चा संभाल लिया है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने अखिलेश यादव के इस प्रयास पर कड़ा तंज कसा है। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव चाहे अपना पूरा शरीर नीला रंग लें, लेकिन दलित समाज समाजवादी पार्टी के साथ नहीं जाने वाला है। लोकसभा चुनाव 2024 में दलित वोटों के हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए बीजेपी ने सरकार के स्तर पर काम शुरू कर दिया है। योगी सरकार ने डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य दलित महापुरुषों के स्मारकों, पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव व सुरक्षा के लिए 400 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट आवंटित किया है। इस योजना के जरिए हर विधानसभा क्षेत्र में लगभग 10 स्थानों को चिन्हित कर वहां सुरक्षा के लिए बाउंड्री वॉल और ग्रिल लगाने का काम पूरा किया जाएगा।
दलित वोटों का बदलता समीकरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक समय मायावती को दलितों का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था और वे चार बार मुख्यमंत्री पद पर रहीं। हालांकि, साल 2014 के बाद से दलित वोटों का रुझान बसपा से हटकर काफी हद तक बीजेपी की ओर बढ़ा है। हालिया आंकड़ों और सर्वे के अनुसार, वर्ष 2024 के दौरान मायावती को 44 फीसदी जाटव वोट मिले, जबकि इंडिया गठबंधन को 25 फीसदी और एनडीए को 24 फीसदी वोट प्राप्त हुए। इसके विपरीत, गैर-जाटव दलित मतदाताओं की बात करें तो इंडिया गठबंधन को 56 फीसदी, एनडीए को 29 फीसदी और बसपा को मात्र 15 फीसदी वोट ही मिले। अब इन आंकड़ों के बीच अखिलेश यादव की कोशिश अपने वोट बैंक को बढ़ाने की है, जबकि बीजेपी के लिए चुनौती अपने उस जनाधार को बचाने की है जो उसे पिछले चुनाव में मिला था।
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