सेना की ताकत में इजाफा
भारतीय सेना के बख्तरबंद दस्ते को और अधिक सशक्त और आधुनिक बनाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मंत्रालय ने 21 सितंबर को नई दिल्ली में एक ऐतिहासिक करार को अंतिम रूप दिया है, जिसके तहत सेना के मौजूदा T-72 और T-90 मुख्य युद्धक टैंकों को अपग्रेड किया जाएगा। इस परियोजना की कुल लागत 586 करोड़ रुपये तय की गई है। इस बड़ी डील के माध्यम से सेना को स्वदेशी तकनीक से निर्मित ऑक्जिलरी पावर यूनिट (APU) प्राप्त होंगी।
स्वदेशी तकनीक का दम
यह समझौता पुणे स्थित कंपनी एक्यूरेट इंडस्ट्रियल कंट्रोल्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ संपन्न हुआ है। इस परियोजना को मेक-II श्रेणी के अंतर्गत रखा गया है, जो प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य टैंकों के महत्वपूर्ण पुर्जों के लिए विदेशों पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना है। अब इन टैंकों की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए आवश्यक उपकरण देश के भीतर ही निर्मित होंगे, जो न केवल सेना की सामरिक आत्मनिर्भरता को बढ़ाएंगे बल्कि दुश्मन की किसी भी चालाकी को विफल करने में भी मददगार साबित होंगे।
क्या है ऑक्जिलरी पावर यूनिट और इसके फायदे
ऑक्जिलरी पावर यूनिट को सरल शब्दों में एक बैकअप पावर जनरेटर समझा जा सकता है। युद्ध के दौरान जब टैंक को किसी सुरक्षित स्थान पर छिपकर घात लगाने की स्थिति में होना पड़ता है, तब उसे अपने भारी-भरकम 1000 हॉर्सपावर के मुख्य इंजन को चालू रखने की आवश्यकता नहीं होगी। यह APU टैंक के तमाम महत्वपूर्ण सिस्टम जैसे कि फायर कंट्रोल सिस्टम, गन स्टेबिलाइजेशन, नाइट विजन उपकरण और फायरिंग सर्किट को निरंतर बिजली की आपूर्ति करता रहेगा।
इसके इस्तेमाल से दो प्रमुख लाभ होंगे। पहला, इससे टैंक के डीजल की भारी खपत में कमी आएगी। दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि मुख्य इंजन बंद रहने के कारण टैंक से न तो शोर निकलेगा और न ही यह दुश्मन के थर्मल या इंफ्रारेड रडार की पकड़ में आसानी से आएगा। इसे ही सैन्य भाषा में साइलेंट हंटिंग या चुपचाप शिकार करना कहा जाता है।
T-90 भीष्म की मारक क्षमता
भारतीय सेना का T-90 भीष्म टैंक विश्व के सबसे आधुनिक और शक्तिशाली टैंकों में गिना जाता है। इस टैंक की मुख्य विशेषता इसकी 125 एमएम की स्मूथबोर गन है, जो सटीकता के साथ गोले दागने के अलावा एंटी-टैंक मिसाइलें छोड़ने में भी सक्षम है। रात के अंधेरे में भी यह टैंक घातक साबित होता है, क्योंकि इसमें मौजूद थर्मल इमेजिंग साइट इसे पांच किलोमीटर की दूरी से दुश्मन की स्थिति भांपने और उसे नष्ट करने की शक्ति देती है। साथ ही, इसका कंचन आर्मर और कॉन्टैक्ट-5 एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर दुश्मन के सीधे मिसाइल हमलों को भी हवा में ही बेअसर कर देता है।
T-72 टैंक का दबदबा
भारतीय सेना की रीढ़ कहे जाने वाले T-72 टैंक अपनी फुर्ती और भरोसे के लिए जाने जाते हैं। यह टैंक हर तरह के कठिन भौगोलिक हालात में प्रभावी है, चाहे वह लद्दाख की जमा देने वाली ठंड हो या थार का झुलसा देने वाला रेगिस्तान। अपनी 125 एमएम की गन से यह किसी भी मजबूत बंकर को पल भर में ध्वस्त करने में माहिर है। नए अपग्रेड्स के बाद इसका कॉकपिट और गन कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह डिजिटल हो चुका है, जो इसे आधुनिक युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार रखता है।
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