शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ में शिक्षा के दावों और हकीकत के बीच की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के रिक्त पदों की भरमार ने शिक्षा के स्तर को बुरी तरह प्रभावित किया है। छात्र अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजोकर स्कूल तो जाते हैं, लेकिन वहां की बदहाल स्थिति उनके सपनों को चकनाचूर कर रही है। स्थिति इतनी गंभीर है कि छात्रों को न केवल संसाधनों की कमी से जूझना पड़ रहा है, बल्कि बुनियादी शिक्षा के अधिकार से भी वंचित होना पड़ रहा है।
खाली पदों का बढ़ता आंकड़ा और भविष्य पर खतरा
आंकड़ों पर गौर करें तो छत्तीसगढ़ के स्कूलों में शिक्षकों की कमी का संकट बहुत गहरा है। राज्य में कुल 50,472 शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं। इसके अतिरिक्त, सहायक शिक्षकों के 30,172 पद भी रिक्त हैं। प्रदेश के 38,256 से अधिक सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 36 लाख से ज्यादा बच्चे इस संकट के सीधे शिकार हो रहे हैं। शिक्षकों की अनुपलब्धता का सीधा असर बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
विषय की अनिवार्यता और शिक्षकों का अभाव
शिक्षा विभाग की लाचारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई स्कूलों में गणित जैसे महत्वपूर्ण विषयों के कोर्स ही बंद कर दिए गए हैं। जो बच्चे इंजीनियरिंग या तकनीकी क्षेत्र में अपना करियर बनाने का सपना देखते हैं, उन्हें शिक्षक न मिलने के कारण अपने विषय बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कई स्कूलों में तो पिछले तीन सालों से शिक्षकों की तैनाती ही नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में छात्र या तो स्वयं अध्ययन करने को विवश हैं या फिर अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ने को मजबूर हैं।
कृषि शिक्षक पढ़ा रहे आईटी
व्यवस्था का आलम यह है कि विषयों के चयन में भी कोई तार्किकता नहीं बची है। कुछ स्कूलों में तो कृषि विषय के शिक्षकों को आईटी जैसे तकनीकी विषय पढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सबसे हैरानी की बात यह है कि इन स्कूलों में कंप्यूटर तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है। बिना संसाधन और बिना विषय विशेषज्ञ के छात्रों को आईटी पढ़ाया जाना एक मजाक बनकर रह गया है। इसके अलावा, छात्रों को जर्जर भवनों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। बरसात के दिनों में छत से पानी टपकने की समस्या आम है, जिससे बच्चों और उनके सामान का नुकसान होता है और पढ़ाई बाधित होती है।
अधिकारियों और सरकार का क्या है कहना
इस पूरे मामले पर रायपुर के जिला शिक्षा अधिकारी सतीश कुमार ने स्थिति की गंभीरता को स्वीकार किया है। उन्होंने माना कि शिक्षकों की कमी का सीधा असर स्कूलों की शिक्षण व्यवस्था पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्कूलों में एडजस्टमेंट के जरिए पढ़ाई को किसी तरह चलाया जा रहा है। हालांकि, उन्होंने खुद यह बात स्वीकार की है कि यह कोई स्थायी समाधान नहीं है और पदों को भरना अनिवार्य है।
दूसरी ओर, राज्य के शिक्षा मंत्री गजेन्द्र यादव ने बताया कि सरकार इस मुद्दे पर गंभीर है। उन्होंने कहा कि जिन भी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की सूचना मिल रही है, वहां से जानकारी जुटाई जा रही है। मंत्री के अनुसार, वर्तमान में 5 हजार शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया चल रही है, जिसके जरिए इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा।
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