उद्धव और ममता के बाद राहुल-केजरीवाल की बारी, क्या मोदी के सामने इंडी गठबंधन का होगा फुल पैकअप?

पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीतिक जमीन खिसकने के बाद अब विपक्षी गठबंधन के सामने अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है, जहाँ राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल की राहें सबसे कठिन दिख रही हैं।

राजनीति का बदलता गणित और इंडी गठबंधन का भविष्य

भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय एक बड़ा सवाल जोर-शोर से तैर रहा है कि क्या उद्धव ठाकरे और ममता बनर्जी के बाद अब राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल का नंबर आ गया है। जिस तरह से प्रमुख विपक्षी दलों के सामने चुनौतियाँ खड़ी हो रही हैं, उससे यह कयास लगने लगे हैं कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने विपक्षी गठबंधन यानी इंडी ब्लॉक का पूरी तरह से पैकअप होने वाला है। ममता बनर्जी और उद्धव ठाकरे कभी वो नेता थे जो आए दिन बड़ी-बड़ी बातें करते थे और दावा करते थे कि कल मोदी को कुर्सी से हटा देंगे। लेकिन आज के दौर में उनकी खुद की राजनीति रसातल में जाती दिख रही है। अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी उसी रास्ते पर हैं, क्योंकि आगामी उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव उनके लिए किसी बड़े टेस्ट से कम नहीं हैं।

ममता बनर्जी की पार्टी में बिखराव का मंजर

जून 2026 में बंगाल से लेकर दिल्ली तक एक खबर ने विपक्ष की सियासत को हिलाकर रख दिया। तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से किनारा करते हुए एनडीए को समर्थन देने का संकेत दिया। शुरुआती जानकारी के अनुसार इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को अपने नए राजनीतिक रुख से अवगत कराने की तैयारी कर ली थी। यह मामला सिर्फ कौन किसके साथ जा रहा है, तक सीमित नहीं है बल्कि बंगाल में आगामी उपचुनावों के मद्देनजर पूरी पटकथा ही बदल गई है। अब चर्चा इस बात की है कि क्या तृणमूल कांग्रेस का नाम और चुनाव चिह्न भी बच पाएगा। जिस तरह से ममता बनर्जी की पार्टी बंगाल के पिछले चुनावों में कमजोर हुई, क्या वह अपना राजनीतिक अस्तित्व पूरी तरह खो देगी? लोकसभा में सांसदों की संख्या किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए राष्ट्रीय शक्ति का आधार होती है, लेकिन अब ये बागी सांसद नेशनल सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में शामिल होकर अपनी अलग डगर चुन चुके हैं।

दुर्गा पूजा और बंगाल की राजनीति का नया मोड़

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या दुर्गा पूजा के बाद ममता बनर्जी की पार्टी का विसर्जन हो जाएगा। यह शब्द भले ही कठोर लगे, लेकिन बंगाल में भाजपा की बढ़ती सक्रियता ममता की पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हो रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बंगाल दौरे और विशेषकर दुर्गा पूजा कार्यक्रमों को लेकर अटकलें तेज हैं। दावा किया जा रहा है कि ईडन गार्डन में पीएम मोदी के कार्यक्रम की बुकिंग हुई है और इसमें तृणमूल कांग्रेस के उन 20 बागी सांसदों के भी शामिल होने की संभावना है। यह घटनाक्रम ममता की पार्टी में टूट की कहानी को एक नए चरण पर ले जा सकता है। यद्यपि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री रही हैं और विपक्ष की राष्ट्रीय राजनीति में भी उनका कद बड़ा रहा है, लेकिन अब उनके गुट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। चुनाव आयोग ने उपचुनावों से पहले पार्टी के नाम और निशान पर रोक लगा दी है, जिसे चुनौती देते हुए ममता गुट ने दो याचिकाएं दायर की हैं।

विपक्ष में बिखरते क्षेत्रीय मोर्चे

बंगाल से शुरू हुई यह टूट की कहानी अब मुंबई, दिल्ली और चेन्नई तक पहुंच चुकी है। डीएमके नेता कनिमोझी का विभिन्न क्षेत्रीय नेताओं से मिलना इसी बिखरते विपक्ष को जोड़ने या नई रणनीति बनाने का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने पहले उद्धव ठाकरे, फिर शरद पवार और सुप्रिया सुले और अंत में ममता बनर्जी से मुलाकात की है। इन मुलाकातों के बाद कांग्रेस के बिना एक नए क्षेत्रीय मोर्चे की चर्चा भी तेज हुई है। सवाल सिर्फ सांसदों के बचे रहने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि जो बचे हैं, वे किसके साथ खड़े होंगे। जिस तरह से महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी टूट गई और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सिंबल पर संकट खड़ा हुआ है, उससे विपक्षी खेमे में घबराहट साफ देखी जा सकती है। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता इन घटनाओं से चिंतित हैं क्योंकि उन्हें आने वाले चुनावों में अपनी साख बचानी है।

2027 की चुनावी जंग और राहुल-केजरीवाल की चुनौती

वर्ष 2027 में देश के दो बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं जो राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक भविष्य का फैसला करेंगे। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं जहाँ कांग्रेस को पिछले प्रदर्शन से बेहतर करने की चुनौती है। वहीं दूसरी ओर पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है जहाँ केजरीवाल के कामकाज की अग्निपरीक्षा होनी है। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल को यह बखूबी पता है कि राजनीति में सिर्फ भाषण काम नहीं आते, बल्कि चुनावी नतीजे ही असल पैमाना होते हैं। मोदी की आंधी में पिछले 10 वर्षों में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का अभेद्य माना जाने वाला किला भी ढह चुका है। अब उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के सामने खुद को साबित करने का लिटमस टेस्ट है। वे लगातार संविधान, बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन सवाल संगठन की मजबूती और भीड़ को वोट में बदलने का है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 399 सीटों पर चुनाव लड़कर महज 2 सीटों पर जीत हासिल की थी और उन्हें कुल वोट प्रतिशत का सिर्फ 2.33% हिस्सा मिला था।

कांग्रेस का यूपी में अस्तित्व और समाजवादी पार्टी

कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में राहें आसान नहीं हैं। पार्टी अमेठी और रायबरेली जैसे अपने पुराने गढ़ों में भी हार का सामना कर चुकी है। यदि कांग्रेस को 2029 में राहुल गांधी को विपक्ष का मुख्य चेहरा बनाना है, तो उन्हें यूपी में अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी। वर्तमान में जमीनी स्तर पर कांग्रेस की उपस्थिति बहुत प्रभावी नहीं दिखती। अखिलेश यादव अपनी समाजवादी पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं और वे शायद ही कांग्रेस को अपने हिस्से की सीटों का ज्यादा लाभ देना चाहेंगे। चुनाव में अब केवल 5 महीने का समय शेष है और हलचल बढ़ती जा रही है।

केजरीवाल की दिल्ली और पंजाब की चिंता

अरविंद केजरीवाल के सामने भी चुनौतियां कम नहीं हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 में आम आदमी पार्टी को करारी शिकस्त मिली, जहाँ 10 साल तक सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी को केवल 22 सीटें मिलीं। पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों के बागी होने से संकट और बढ़ गया है। पंजाब में अब केजरीवाल के लिए सरकार बचाने की चुनौती है। विपक्षी दल भाजपा ने भगवंत मान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। रवनीत सिंह बिट्टू जैसे नेताओं ने सरकारी कामकाज और कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठाए हैं। विपक्षी दल अक्सर सरकार पर नशे के व्यापार को बढ़ावा देने और प्रशासनिक विफलता के गंभीर आरोप लगाते रहे हैं। इंडी गठबंधन में शामिल दलों के बीच भी राज्यों में आपसी खींचतान जारी है, जहाँ कांग्रेस और आम आदमी पार्टी कहीं सहयोगी तो कहीं एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। अंततः यह देखना बाकी है कि क्या विपक्ष मोदी के सामने टिक पाएगा या उनकी आपसी लड़ाई और बिखराव उन्हें इतिहास के पन्नों में और पीछे धकेल देगा।

  • प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बनाम विपक्षी गठबंधन की रणनीति।
  • तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का भविष्य और NCPI का गठन।
  • राहुल गांधी के कार्यक्रमों में मर्यादा और भाजपा द्वारा उठाई गई आपत्तियाँ।
  • दिल्ली, बिहार, असम और बंगाल समेत 22 राज्यों में एनडीए की सरकारें।
  • यूपी चुनाव 2027 में कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीतिक परीक्षा।
  • पंजाब में भगवंत मान सरकार के खिलाफ विपक्ष का सख्त रुख।

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