वाराणसी में सुरक्षाबलों की बड़ी कार्रवाई
धर्मनगरी वाराणसी में रविवार, 20 सितंबर की सुबह चार बजे का वक्त सुरक्षा बलों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लंका मैदान और पड़ाव के आसपास का इलाका अचानक गोलियों की गूंज से थर्रा उठा। एक तरफ उत्तर प्रदेश एटीएस (ATS) और पुलिस के जांबाज कमांडो तैनात थे, तो दूसरी तरफ कुख्यात नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह था। दोनों हाथों में पिस्तौल थामे बृजेश ने सुरक्षाबलों पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। मुठभेड़ के बाद जब गोलियों का शोर थमा, तो सड़क पर 30 लाख रुपये का इनामी उग्रवादी सरगना लहूलुहान अवस्था में पड़ा था। उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बृजेश गंझू वही नाम है जिसके खौफ से झारखंड और बिहार के कोयलांचल में ट्रांसपोर्टरों से लेकर बड़े ठेकेदारों तक की रूह कांप जाती थी।
ऑपरेशन और मुठभेड़ की पूरी कहानी
यूपी एटीएस को गोपनीय इनपुट मिला था कि झारखंड का सबसे वांछित नक्सली कमांडर अपने एक साथी के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर रामनगर और मुगलसराय की दिशा में भागने की फिराक में है। एटीएस के डिप्टी एसपी विपिन राय के नेतृत्व में कमांडोज ने लंका मैदान के पास जाल बिछा दिया था। जैसे ही संदिग्ध मोटरसाइकिल दिखाई दी, टीम ने उन्हें रुकने का संकेत दिया। पकड़े जाने के डर से बृजेश ने चलती बाइक से छलांग लगा दी और अपने दोनों हाथों में मौजूद पिस्तौलों से एटीएस की टीम पर अंधाधुंध गोलियां बरसाना शुरू कर दिया। इस हमले में एटीएस के डीएसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण के सीने पर गोलियां लगीं, लेकिन बुलेटप्रूफ जैकेट पहनने के कारण उनकी जान बच गई। इसके बाद सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभालते हुए जवाबी कार्रवाई की। मुठभेड़ स्थल से दो पिस्टल, भारी मात्रा में जिंदा कारतूस और खोखे बरामद किए गए हैं। उसका साथी बाइक छोड़कर भागने में सफल रहा, जिसे बाद में हिरासत में लेकर कड़ी पूछताछ की जा रही है।
पंचायत के मुखिया से खूंखार नक्सली तक का सफर
46 वर्षीय बृजेश गंझू, जो स्वर्गीय पंचू गंझू का पुत्र था, मूल रूप से झारखंड के चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र स्थित लूटू गांव का निवासी था। उसकी कहानी किसी फिल्म से कम नहीं है। वह एक तरफ अपराधी था तो दूसरी तरफ सफेदपोश राजनीति में भी सक्रिय था। वर्ष 2010 में उसने लावालौंग पंचायत से निर्विरोध मुखिया का चुनाव जीता था। गांव की चौपाल में बैठकर सरकारी योजनाओं को लागू करने वाला यही शख्स परदे के पीछे से जंगलों में खूनी साजिशें रचने में जुटा था। उसने कानून को चकमा देने के लिए गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन, फुलचंद गंझू और सरदार जैसे कई छद्म नाम अपना रखे थे।
तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) का गठन
बृजेश गंझू की शुरुआत भाकपा माओवादी संगठन के साथ हुई थी। लेकिन विचारधारा और वर्चस्व की लड़ाई के साथ-साथ पैसों के बंटवारे को लेकर मतभेद पैदा हुए, जिसके बाद 2004 में उसने माओवादियों से बगावत कर अपना एक अलग विद्रोही गुट खड़ा किया। इसे 'तृतीय प्रस्तुति कमेटी' यानी टीपीसी का नाम दिया गया। पिछले दो दशकों से इस गुट और माओवादियों के बीच चले खूनी संघर्ष में न केवल कई उग्रवादी बल्कि निर्दोष नागरिक भी मारे गए। बृजेश ने देखते ही देखते चतरा, लातेहार, पलामू, हजारीबाग, रामगढ़ और रांची के अलावा बिहार के सीमावर्ती जिलों तक अपना खौफनाक नेटवर्क फैला दिया।
लेवी का काला कारोबार और कोयला खदानों पर कब्जा
शुरुआती दौर में बृजेश जंगलों में बीड़ी पत्ता तोड़ने वाले ठेकेदारों से रंगदारी यानी लेवी वसूला करता था। लेकिन जब चतरा में सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (CCL) की आम्रपाली और मगध जैसी विशाल कोल परियोजनाएं शुरू हुईं, तो उसकी नजर कोयले के अरबों रुपये के कारोबार पर टिक गई। उसने अपने शूटरों के जरिए कोल कंपनियों, ट्रांसपोर्टरों और ठेकेदारों को डराना-धमकाना शुरू किया। हर टन कोयले की ढुलाई पर उसका फिक्स कमीशन तय था। जो भी इसका विरोध करता, उसकी गाड़ियां फूंक दी जातीं या कर्मचारियों को जान से मार दिया जाता था। चतरा जिले में ही उसके खिलाफ हत्या, लूट, आगजनी और रंगदारी जैसे 39 से अधिक मुकदमे दर्ज थे।
एनआईए (NIA) के लिए क्यों था सिरदर्द
बृजेश गंझू केवल राज्य पुलिस के लिए ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के लिए भी बड़ी चुनौती बना हुआ था। 2018 में चतरा के टंडवा थाना क्षेत्र में मगध और आम्रपाली कोल परियोजनाओं से जुड़े टेरर फंडिंग के मामले की जांच जब एनआईए ने अपने हाथों में ली, तो पता चला कि कोल कंपनियों से वसूली गई करोड़ों रुपये की राशि टीपीसी तक पहुंचाई जा रही थी। इस पैसे का इस्तेमाल आधुनिक हथियार खरीदने और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने में किया जा रहा था। एनआईए द्वारा दाखिल चार्जशीट में मुख्य 17 आरोपियों में बृजेश का नाम शामिल था। इसी कारण एनआईए ने उस पर 5 लाख का इनाम घोषित किया था, जबकि झारखंड पुलिस ने 25 लाख का इनाम रखा था। आठ साल पहले ही उसके घर की कुर्की और जब्ती की जा चुकी थी।
आतंक के साम्राज्य का अंत
उत्तर प्रदेश के एडीजी अमिताभ यश के निर्देश पर इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। मुठभेड़ स्थल से 2 पिस्टल, 1 आधुनिक कार्बाइन, बड़ी संख्या में कारतूस और 1 लाख रुपये की नकदी मिली है। जांच एजेंसियां अब इस बात की पड़ताल कर रही हैं कि आखिर बृजेश वाराणसी क्यों आया था। क्या वह यहां छिपने का नया ठिकाना तलाश रहा था या हथियारों की किसी बड़ी डील के लिए आया था? बहरहाल, 20 सालों तक झारखंड और बिहार के कोयलांचल में आतंक का पर्याय बना रहा 'मुखिया जी' अब कानून की पकड़ से बाहर होकर हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। पुलिस अब उसके शेष संपर्कों की पहचान करने में जुटी है।
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