गुजरात के वाडिया गांव का खौफनाक सच
गुजरात के बनासकांठा जिले में बसा वाडिया गांव आज एक ऐसी सच्चाई के साथ खड़ा है जिसे सुनकर किसी का भी दिल दहल जाए। अहमदाबाद से लगभग दो सौ किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की कहानी कोख से कोठे तक की उस अमानवीय यात्रा को बयां करती है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। यहां के हालात इतने भयावह रहे हैं कि जो पिता अपनी बेटियों के लिए रक्षक माने जाते हैं, वही लोग अपने ही घर की महिलाओं के लिए ग्राहक ढूंढने का काम करते थे। अब इसी नर्क और अंधेरे दलदल से अपनी बेटियों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए माता-पिता ने एक अनोखा और चौंकाने वाला रास्ता अपनाया है। अब यहां मासूम बच्चियों की सात साल की उम्र में ही सगाई कर दी जा रही है।
पीढ़ियों से चला आ रहा दर्दनाक दलदल
बनासकांठा जिले के इस छोटे से गांव की कुल आबादी लगभग साढ़े सात सौ लोगों की है। इस गांव की फिजाओं में बरसों से एक खौफ और लाचारी घुली हुई है। यहां रहने वाला घुमंतू समुदाय सदियों से इस दंश को झेल रहा है। इस प्रथा के तहत महिलाओं को जबरन देह व्यापार में झोंक दिया जाता था। सुबह होते ही गांव के पुरुष पालनपुर-थराद हाईवे की ओर निकल जाते थे। उनका मकसद किसी रोजगार की तलाश करना नहीं, बल्कि ट्रक ड्राइवरों और हाईवे से गुजरने वाले राहगीरों को अपनी ही पत्नी और घर की अन्य महिलाओं के लिए ग्राहक के रूप में फंसाना होता था।
यहां का माहौल इतना दूषित था कि कई लड़कियों को यह तक पता नहीं होता था कि जो व्यक्ति उनका पिता कहला रहा है, वह उनका असली जैविक पिता है भी या नहीं। यह पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी कुप्रथा थी जिसने न जाने कितनी जिंदगियों को समय से पहले ही बर्बाद कर दिया। भुखमरी और गरीबी के कारण यह सब इस समुदाय के लिए एक सामान्य जीवन प्रक्रिया जैसा बन गया था, जिसने हर मासूम बच्ची के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया था।
सगाई बना एक सुरक्षा कवच
भारत में बाल विवाह कानूनन अपराध है, लेकिन वाडिया गांव के इन परिवारों के लिए सात से बारह साल की उम्र में बेटियों की सगाई करना किसी वरदान या सुरक्षा कवच से कम नहीं है। गांव में अब एक अनकहा नियम बन गया है कि जिस बच्ची की सगाई या शादी तय हो जाती है, उसे इस घिनौने दलदल से दूर रखा जाएगा। एक सामाजिक बुराई को रोकने के लिए मजबूरन उन्हें दूसरी सामाजिक बुराई का सहारा लेना पड़ रहा है।
इस दर्दनाक माहौल से निकलकर अपना भविष्य संवारने वाली एक 19 साल की युवती की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। उसकी मां और दादी खुद इसी दलदल का शिकार थीं, लेकिन उसकी मां ने ठान लिया था कि वह अपनी बेटी को इस नर्क में नहीं झोंकेगी। परिणाम यह हुआ कि उस लड़की की महज ग्यारह साल की उम्र में सगाई कर दी गई और अठारह साल की होते-होते उसका विवाह हो गया। आज वह गांव से दूर कॉलेज में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है और एक सम्मानजनक जीवन जी रही है। इसी तरह, एक अन्य महिला जिसे खुद पंद्रह साल की उम्र में इस दलदल में धकेला गया था, उसने भी अपनी बेटी की बारह साल की उम्र में सगाई तय कर दी ताकि उसका अपना अतीत बेटी के सुनहरे भविष्य के आड़े न आए।
बदलाव की ओर बढ़ते कदम
साल 2012 में वाडिया गांव में बदलाव की एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। कुछ समाजसेवी संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गांव के लोगों के साथ संवाद स्थापित किया। ‘विचरता समुदाय समर्थन मंच’ (VSSM) की संस्थापक मित्तल पटेल ने इन परिवारों को काउंसिल किया और उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे अपनी बेटियों को इस दलदल में न भेजें। उनके प्रयासों के बाद गांव में पहली बार सामूहिक विवाह का आयोजन शुरू हुआ। अब हर साल यहां ऐसे समारोह आयोजित किए जाते हैं। हालांकि कुछ लोग कम उम्र में सगाई कराने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन सभी का यह मानना है कि देह व्यापार में धकेले जाने से तो यह रास्ता कहीं अधिक बेहतर और सुरक्षित है।
इतिहास का काला अध्याय और भविष्य की आशा
अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि सरानिया समुदाय कभी मेवाड़ के महाराणा प्रताप की सेना के साथ चला करता था। उस दौर में पुरुष युद्ध के लिए तलवार और ढाल तैयार करते थे और महिलाएं सैनिकों का मनोरंजन करती थीं। लेकिन देश की आजादी के बाद जब रोजी-रोटी का गहरा संकट आया, तो इस समुदाय ने धीरे-धीरे इसी रास्ते को अपनी आजीविका का जरिया बना लिया।
आज वाडिया गांव धीरे-धीरे ही सही, लेकिन एक सुरक्षित और उज्जवल भविष्य की ओर कदम बढ़ा रहा है। हालांकि, अतीत के काले साये अभी भी उनका पूरी तरह पीछा नहीं छोड़ पाए हैं, लेकिन कोख से कोठे तक के इस भयानक सफर को खत्म करने की दिशा में एक बड़ी पहल जरूर हुई है। आज इस गांव की बेटियां स्कूल और कॉलेज की राह पकड़ रही हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि थोड़ी सी हिम्मत, सही मार्गदर्शन और सामाजिक सहयोग से इस खौफनाक प्रथा का अंत संभव है।
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