सिंहस्थ महाकुंभ 2026 की भव्य तैयारियों का आगाज
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक सिंहस्थ महाकुंभ 2026 के भव्य आयोजन को लेकर नासिक में प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। आगामी 31 अक्टूबर को नासिक और त्र्यंबकेश्वर में आयोजित होने वाले ध्वजारोहण कार्यक्रम के लिए कुंभ मेला प्रशासन और कुंभ मेला प्राधिकरण की ओर से एक महत्वपूर्ण तैयारी बैठक संपन्न की गई है। इस बैठक की अध्यक्षता पालकमंत्री एवं कुंभ मेला मंत्री गिरीश महाजन ने की। इस अवसर पर विभिन्न अखाड़ों के प्रतिनिधि, संत, महंत और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहे। बैठक का मुख्य उद्देश्य ध्वजारोहण के कार्यक्रम को सनातन धर्म की प्राचीन परंपराओं के अनुरूप भव्य और अनुशासित तरीके से संपन्न कराना है। सनातन धर्म में कुंभ मेला न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह विश्व के सबसे बड़े आध्यात्मिक समागमों में गिना जाता है, जो प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर निर्धारित होता है।
दो प्रमुख स्थानों पर ध्वजारोहण की विशेष योजना
सिंहस्थ महाकुंभ के औपचारिक शुभारंभ के लिए दो मुख्य स्थान चिन्हित किए गए हैं। नासिक में रामकुंड घाट और त्र्यंबकेश्वर में कुशावर्त कुंड, जो त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर के समीप स्थित है, वहां ध्वजारोहण की रस्म पूरी की जाएगी। मंत्री गिरीश महाजन ने इस कार्यक्रम के समय की पुष्टि करते हुए बताया कि 31 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 2 मिनट पर नासिक और त्र्यंबकेश्वर में एक साथ ध्वजारोहण किया जाएगा। यह समय आयोजन के औपचारिक शुभारंभ का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जा रहा है। प्रशासनिक योजना के अनुसार, एक स्थान पर भारत की महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के करकमलों द्वारा ध्वजारोहण संपन्न कराने का प्रस्ताव है, जबकि दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की गरिमामयी उपस्थिति में यह धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इस दौरान केंद्र और राज्य सरकार के कई अन्य वरिष्ठ नेता भी इस ऐतिहासिक साक्षी बनने के लिए उपस्थित रहेंगे।
सिंहस्थ का अर्थ और धार्मिक महत्व
सिंहस्थ कुंभ मेला हिंदू धर्म के सबसे पवित्र आयोजनों में से एक है, जिसमें शामिल होने के लिए पूरी दुनिया से लाखों श्रद्धालु भारत आते हैं। मुख्य रूप से उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर आयोजित होने वाला यह पर्व अपनी विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब गुरु यानी बृहस्पति ग्रह सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, उस विशेष कालखंड में आयोजित होने के कारण इसे 'सिंहस्थ' कहा जाता है। यह कुंभ मेला पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान अमृत के गिरने के स्थानों से जुड़ा है, जिसके कारण इन क्षेत्रों में स्नान और दान का विशेष महत्व है।
21 महीने तक चलेगा आयोजन
इस बार का नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ महाकुंभ अपनी लंबी अवधि के कारण काफी चर्चा में है। यह मेला 31 अक्टूबर 2026 को शुरू होगा और इसका समापन 24 जुलाई 2028 को होगा। राजा हर्षवर्धन के कालखंड से चली आ रही परंपरा के अनुसार, सिंहस्थ का यह आयोजन लगभग 21 महीने तक चलेगा। यह कुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संत परंपरा, अखाड़ों की शक्ति और आध्यात्मिक जीवन के संगम का एक विराट प्रदर्शन है।
नासिक कुंभ मेला 2027: प्रमुख तिथियां और शेड्यूल
मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा और धार्मिक विधियों के लिए एक निश्चित कार्यक्रम तैयार किया गया है:
- ध्वजारोहण: 31 अक्टूबर 2026
- नगर प्रदक्षिणा: 29 जुलाई 2027
- पहला अमृत स्नान: 2 अगस्त 2027
- दूसरा अमृत स्नान: 31 अगस्त 2027
- तीसरा अमृत स्नान (नासिक): 11 सितंबर 2027
- तीसरा अमृत स्नान (त्र्यंबकेश्वर): 12 सितंबर 2027
- समापन समारोह: 24 जुलाई 2028
आस्था और आध्यात्म का संगम
सिंहस्थ महाकुंभ के दौरान होने वाले शाही स्नान और प्रमुख स्नान पर्व इस मेले का मुख्य आकर्षण होते हैं। विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत पारंपरिक वेशभूषा और अनुष्ठानों के साथ पवित्र नदियों में स्नान करते हैं, जिन्हें देखने के लिए देश-विदेश से भक्त उमड़ पड़ते हैं। यह आयोजन भारतीय संस्कृति की गहराई को समझने का एक अवसर प्रदान करता है। उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की मौजूदगी इस आयोजन की दिव्यता को कई गुना बढ़ा देती है। नासिक और त्र्यंबकेश्वर में जुटने वाले लाखों श्रद्धालु न केवल नदी में आस्था की डुबकी लगाएंगे, बल्कि वे साधु-संतों के प्रवचन और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेंगे। यह कुंभ मेला आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं ताकि करोड़ों लोगों की आस्था का यह महापर्व बिना किसी व्यवधान के शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो सके।
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