राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल अक्सर अपने जीवन और करियर से जुड़े कई अनसुने किस्से साझा करते रहते हैं। हाल ही में उन्होंने IIT रुड़की के दीक्षांत समारोह में हिस्सा लिया और वहां मौजूद छात्रों को संबोधित करते हुए अपने शुरुआती करियर की एक बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाली घटना का जिक्र किया। डोभाल ने बताया कि उनके जीवन में एक ऐसा समय भी आया था जब उन्हें पूरा यकीन हो गया था कि अब उनका करियर हमेशा के लिए समाप्त होने वाला है। यह वाकया उस समय का है जब वे सिक्किम में तैनात थे और वहां खुफिया विभाग का काम देख रहे थे।
सिक्किम में जब खुफिया विभाग के प्रभारी बने थे डोभाल
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने बताया कि यह वाकया काफी साल पुराना है। उन्होंने कहा, 'मैं एक युवा IPS अधिकारी था और खुफिया विभाग के काम में बिल्कुल नया था। मेरी उम्र करीब 20 से 25 साल के बीच रही होगी जब मुझे सिक्किम में इंटेलिजेंस का प्रभारी बनाकर भेजा गया था। उस दौर में सिक्किम पूरी तरह से भारत का हिस्सा नहीं बना था, बल्कि उसे भारतीय संघ में शामिल करने की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया चल रही थी। मैं भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा था।'
उन्होंने आगे समझाया कि उनकी इस तैनाती के दौरान उनकी मुख्य जिम्मेदारियों में केवल स्थानीय कानून-व्यवस्था ही नहीं थी, बल्कि सीमा सुरक्षा भी शामिल थी। उन्हें सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा पर करीबी नजर रखने, चीनी सेना यानी PLA की गतिविधियों को मॉनिटर करने और उनकी हरकतों से जुड़ी खुफिया जानकारियां जुटाने का काम सौंपा गया था।
जब लापता हो गया खुफिया मिशन
अजित डोभाल ने मंच से उस रोमांचक घटना का ब्यौरा देते हुए कहा कि एक बार सीमावर्ती इलाकों में हमारी तरफ से एक महत्वपूर्ण खुफिया मिशन भेजा गया था। योजना के अनुसार, इस मिशन पर गए दल को लगभग 8 दिनों के भीतर वापस लौट आना था। लेकिन दिन बीतने के साथ ही तनाव बढ़ने लगा। पहले 5 दिन निकल गए और फिर देखते ही देखते 10 दिन बीत गए, लेकिन उस दल का कोई अता-पता नहीं चला।
उन्होंने कहा, 'एक पेशेवर होने के नाते और एक इंसान के तौर पर भी यह मेरे लिए बहुत बड़ी चिंता की बात थी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि वे लोग जिंदा भी हैं या नहीं या फिर उनके साथ कोई अनहोनी हो गई है।' उस क्षेत्र में किसी बर्फीले तूफान या किसी हादसे की भी कोई खबर नहीं मिली थी, जिससे असमंजस की स्थिति और अधिक गंभीर हो गई थी।
मुख्यालय से आया फोन और खुला बड़ा राज
इस तनावपूर्ण माहौल के बीच अचानक अजित डोभाल के पास उनके वरिष्ठ अधिकारी का फोन आया। उन्होंने बताया, 'मुझे हेडक्वार्टर से फोन आया और मेरे बॉस ने मुझसे सीधे सवाल किया कि क्या तुमने कुछ लोगों को सीमा के उस पार भेजा है? इस पर मैंने जवाब दिया कि मुझे इस बारे में पक्की जानकारी नहीं है, लेकिन हमारे लोग सीमा पर गए हैं जिन्हें अब तक वापस आ जाना चाहिए था। उन्हें 5 या 6 दिनों में लौटना था, लेकिन अब करीब 10 से 11 दिन का लंबा समय बीत चुका है।'
तभी उनके बॉस ने उन्हें एक ऐसी खबर दी जिसने उनके होश उड़ा दिए। उनके बॉस ने बताया कि मिशन पर गए वे सभी लोग इस समय चीनी सेना की हिरासत में हैं। उन्हें चीनियों ने पकड़ लिया था और उनसे लंबी पूछताछ की जा रही थी। हालांकि, बाद में उच्च स्तरीय बातचीत या किसी विशेष समझौते के जरिए चीनी सेना ने उन्हें भारतीय सीमा में वापस भेज दिया। लेकिन जब वे लोग वापस लौटे तो उनकी हालत बहुत बुरी थी और वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके थे।
करियर खत्म होने का डर और जांच की सच्चाई
इस गंभीर चूक के बाद विभाग में एक उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए। अजित डोभाल ने उस समय की अपनी मनःस्थिति को बयां करते हुए कहा, 'जब जांच शुरू हुई, तो मुझे लगा कि अब मेरा करियर खत्म हो चुका है। मैं तब महज 20-25 साल का युवा था और मेरा करियर अभी शुरू ही हुआ था। मुझे लग रहा था कि यह एक बेहद गैर-पेशेवर घटना थी और इसकी गाज मुझ पर ही गिरेगी।'
लेकिन जब जांच रिपोर्ट सामने आई तो सच कुछ और ही निकला। जांच में अजित डोभाल को पूरी तरह निर्दोष पाया गया और यह साबित हुआ कि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई थी। असल में, मुख्य मुख्यालय से जो स्केच और मैप उन्हें दिए गए थे, उनमें कुछ गंभीर कमियां और त्रुटियां थीं। उन्हीं गलत नक्शों के कारण ही मिशन दल रास्ता भटक कर गलती से चीनी सीमा के भीतर दाखिल हो गया था। इस रोमांचक किस्से को सुनाने के साथ ही उन्होंने युवाओं को प्रेरित करते हुए एक अहम सीख भी दी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने हाल ही में युवाओं को सलाह देते हुए कहा था कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह नहीं होता कि आप अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी करने लगें।
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