मेवाड़ राजपरिवार के लिए बड़ी क्षति
उदयपुर के ऐतिहासिक मेवाड़ राजपरिवार से एक अत्यंत दुखद समाचार सामने आया है। राजमाता विजयराज कुमारी मेवाड़ अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन से न केवल राजपरिवार में बल्कि उनके द्वारा संचालित सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों से जुड़े लोगों में भी गहरा शोक है। राजमाता का व्यक्तित्व परंपरा और आधुनिकता का एक अनूठा संगम था। उन्होंने अपने जीवनकाल में मेवाड़ की विरासत को न केवल संजोया, बल्कि उसे आधुनिक युग के अनुरूप नई दिशा भी दी। उनके संस्कार और जनसेवा के कार्यों को आने वाली पीढ़ियाँ हमेशा याद रखेंगी।
कच्छ के राजघराने से था गहरा नाता
राजमाता विजयराज कुमारी का जन्म कच्छ के प्रतिष्ठित शाही परिवार में हुआ था। वह महाराज फतेहसिंह जी कच्छ की छोटी पुत्री थीं और कच्छ के महाराव साहब की पौत्री के रूप में जानी जाती थीं। उनकी शिक्षा-दीक्षा ऊटी के फ्रांसिस्कन कॉन्वेंट में संपन्न हुई, जिसने उन्हें बचपन से ही अनुशासन और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूक बनाया। 1960 के दशक में उन्होंने यूरोप और अमेरिका की व्यापक यात्राएं कीं। इन विदेश यात्राओं के दौरान उन्होंने उन देशों में हो रहे तीव्र सामाजिक और आर्थिक बदलावों को बहुत करीब से समझा और अनुभव किया, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।
उदयपुर में विरासत और परोपकार का सफर
महाराणा अरविन्द सिंह मेवाड़ के साथ विवाह के पश्चात राजमाता का जीवन पूरी तरह से मेवाड़ की समृद्ध परंपराओं के साथ जुड़ गया। राजमहल से संचालित होने वाले जनहित और परोपकार के कार्यों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। वह कई निजी और सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्टों की सक्रिय सदस्य रहीं। इनमें श्री एकलिंगजी ट्रस्ट का कार्य विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो मेवाड़ के प्राचीन और पौराणिक मंदिरों के संरक्षण व विकास के लिए समर्पित है। उन्होंने अपनी कार्यकुशलता से इन संस्थाओं को और भी अधिक प्रभावी बनाया।
शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय योगदान
राजमाता विजयराज कुमारी ने शिक्षा के महत्व को गहराई से समझा था। 1980 के दशक के दौरान उन्होंने महाराणा मेवाड़ पब्लिक स्कूल के विकास और संचालन में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। उनके मार्गदर्शन में विद्यालय ने न केवल शैक्षणिक स्तर पर उन्नति की, बल्कि शिक्षा को व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए उत्कृष्टता की ओर कदम बढ़ाया। उनके लिए शिक्षा मात्र किताबों तक सीमित नहीं थी, बल्कि समाज और आने वाली पीढ़ियों के सर्वांगीण विकास का एक प्रमुख माध्यम थी।
आध्यात्मिकता और व्यावसायिक प्रबंधन
शिक्षा और परंपराओं के अलावा, राजमाता का झुकाव अध्यात्म की ओर भी अत्यंत गहरा था। वह बिहार स्कूल ऑफ योग की एक निष्ठावान और समर्पित अनुयायी रहीं। उन्होंने न केवल इस संस्था के सिद्धांतों को आत्मसात किया, बल्कि विद्वान गुरुओं की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार में भी अपना पूरा योगदान दिया। व्यावसायिक मोर्चे पर भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी और हिस्टोरिकल रिसॉर्ट्स होटल्स प्राइवेट लिमिटेड की संयुक्त प्रबंध निदेशक के तौर पर जिम्मेदारी संभाली।
परिवार और संस्कार की विरासत
अपने पारिवारिक जीवन में राजमाता ने अपने बच्चों को न केवल आधुनिक और वैश्विक शिक्षा दी, बल्कि उन्हें भारतीय संस्कारों, आध्यात्मिक चिंतन और परिवार की गौरवशाली परंपराओं से भी जोड़े रखा। आज श्रीजी लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के व्यक्तित्व में जो गंभीरता और सामाजिक सरोकारों के प्रति सक्रियता दिखती है, वह उन्हीं के संस्कारों का परिणाम है। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ आज शिक्षा, संस्कृति और मेवाड़ की समृद्ध विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में निरंतर सक्रिय हैं। राजमाता का जाना न केवल परिवार के लिए, बल्कि पूरे मेवाड़ के लिए एक ऐसे युग की समाप्ति है, जिसने सेवा और संस्कृति को हमेशा सर्वोपरि रखा।
https://hindi.news18.com/photogallery/rajasthan/udaipur-rajmata-vijayraj-kumari-mewar-death-udaipur-royal-family-tradition-service-udaipur-news-local18-10836287.html