भारत में आस्था और इतिहास का एक अटूट संगम देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक ऐसा ही ऐतिहासिक और चमत्कारी मंदिर स्थित है, जो श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का बड़ा केंद्र है। इसे सिद्ध गणेश मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 300 साल से भी अधिक पुराना और बेहद रोमांचक है। यहाँ स्थापित भगवान गणेश की दिव्य प्रतिमा की कहानी सीधे मुगल काल और क्रूर शासक औरंगजेब के शासनकाल से जुड़ी हुई है। इस भव्य प्रतिमा को औरंगजेब के विध्वंसकारी सैनिकों की नजरों से बचाकर हरिद्वार से छतरपुर लाया गया था। इस यात्रा और मंदिर की महिमा के बारे में यहाँ के पुजारी कई दिलचस्प और अनसुने किस्से साझा करते हैं।
औरंगजेब के दौर की ऐतिहासिक गाथा
सिद्ध गणेश मंदिर की देखरेख और सेवा में जुटे गोस्वामी परिवार की 7वीं पीढ़ी के पुजारी दीपक गोस्वामी इस मंदिर के गौरवशाली इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। वे बताते हैं कि यह बात साल 1705 की है, जब भारत पर मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन था। उस दौरान औरंगजेब के आदेश पर पूरे देश में हिंदू मंदिरों और देव प्रतिमाओं को क्रूरतापूर्वक निशाना बनाया जा रहा था। सनातन संस्कृति और आस्था पर बड़ा संकट मंडरा रहा था। इसी कठिन समय में हरिद्वार में रहने वाले हरदेव गोस्वामी (पुरी) और उनकी धर्मपत्नी सावित्रीबाई ने एक अत्यंत साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने भगवान गणेश की इस अति प्राचीन और सुंदर प्रतिमा को औरंगजेब के सैनिकों से बचाने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने गांव के करीब 10 से 15 साहसी लोगों को अपने साथ मिलाया और मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की योजना बनाई।
तीन महीने का कठिन सफर: बैलगाड़ी और हाथी से तय की दूरी
पुजारी दीपक गोस्वामी के अनुसार, इस विशाल और भारी भरकम मूर्ति को हरिद्वार से मध्य प्रदेश के छतरपुर तक लाना कोई आसान काम नहीं था। इस अत्यंत कठिन और खतरों से भरी यात्रा के लिए एक हाथी और चार बैलगाड़ियों का सहारा लिया गया था। सुरक्षा के लिहाज से इस दिव्य प्रतिमा को पूरी तरह से सफेद कपड़ों में लपेटकर छिपाया गया था ताकि किसी को इस बात की भनक न लगे। मुगल सैनिकों और जासूसों की पैनी नजरों से बचने के लिए उन्होंने मुख्य रास्तों के बजाय जंगलों और गुप्त रास्तों का इस्तेमाल किया। सफर के दौरान वे लगातार अपने मार्ग बदलते रहे ताकि सैनिकों को गुमराह किया जा सके। इस तरह बेहद सावधानी बरतते हुए इस यात्रा को पूरा करने में करीब तीन महीने का लंबा समय लगा। आखिरकार, वे सुरक्षित रूप से छतरपुर पहुंचे और यहाँ अत्यंत आदर-सम्मान के साथ इस पावन प्रतिमा की स्थापना की गई। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब ने बाद में भी इस प्रतिमा को खंडित करवाने का प्रयास किया था, लेकिन वह अपने नापाक मंसूबों में पूरी तरह से नाकाम रहा।
पांच फीट ऊंची और अलौकिक है यह प्रतिमा
मंदिर के सेवादार और गोस्वामी परिवार की 6वीं पीढ़ी के पुजारी लखन गोस्वामी ने बताया कि भगवान गणेश की यह भव्य प्रतिमा लगभग पांच फीट ऊंची है। जब इस अलौकिक प्रतिमा को मंदिर बनाकर विधि-विधान से स्थापित किया गया, तो इस मंदिर का नाम सिद्ध गणेश मंदिर रखा गया। स्थानीय श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि यह सिद्ध प्रतिमा अपने नाम के अनुरूप ही अद्भुत चमत्कार दिखाती है और यहाँ आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है।
हनुमान जी की तरह चढ़ाया जाता है सिंदूर का चोला
इस ऐतिहासिक मंदिर की एक और बेहद अनोखी और अद्भुत विशेषता है। पुजारी लखन गोस्वामी बताते हैं कि यह मंदिर छतरपुर के महोबा रोड पर स्थित क्रिश्चियन अस्पताल के बिल्कुल सामने बना हुआ है। आमतौर पर हनुमान जी के मंदिरों में उन्हें सिंदूर का चोला चढ़ाने की परंपरा देखी जाती है, लेकिन इस सिद्ध गणेश मंदिर में भगवान गणेश को भी हनुमान जी की ही तरह हर बुधवार को सिंदूर का विशेष चोला चढ़ाया जाता है और उनका अलौकिक श्रृंगार किया जाता है। यह अनूठी परंपरा आज से नहीं, बल्कि पिछले 320 वर्षों से निरंतर चली आ रही है। पुजारियों का दावा है कि छतरपुर जिले से लेकर पूरे सागर जिले तक में ऐसा कोई दूसरा गणेश मंदिर नहीं है, जहाँ भगवान गणेश को इस प्रकार सिंदूर का चोला अर्पित किया जाता हो। गोस्वामी परिवार की 7 पीढ़ियां लगातार पूरी निष्ठा और भक्ति भाव से भगवान गणेश के इस विग्रह की पूजा-अर्चना और सेवा करती आ रही हैं।
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