मिथिलांचल में 14 सितंबर को धूमधाम से मनाया जाएगा चौरचन पर्व, जानिए चंद्र पूजा का महत्व और अनोखी परंपराएं

मिथिला के प्रसिद्ध लोक पर्व चौरचन को इस वर्ष 14 सितंबर को मनाया जाएगा, जिसमें चंद्रमा की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। यह पर्व पौराणिक कथाओं और चंद्र दोष से मुक्ति दिलाने वाली मान्यताओं के लिए खास माना जाता है।

मिथिला का महापर्व चौरचन

मिथिलांचल की संस्कृति में लोक आस्था का महापर्व चौरचन एक विशेष स्थान रखता है। इस साल यह पर्व 14 सितंबर को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। छठ पूजा की भांति ही इस पर्व में भी चंद्रमा की उपासना की जाती है। चौरचन के दौरान श्रद्धालु हाथ में दही, फल और पारंपरिक पकवान लेकर चंद्रमा के दर्शन करते हैं, जो इस पर्व की सबसे प्रमुख परंपरा है।

पूजा की तिथि और शास्त्रीय महत्व

कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. कुणाल कुमार झा ने बताया कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 14 सितंबर को पड़ रही है। चौरचन जिसे चौठ चंद्र पूजन भी कहा जाता है, उसके लिए चतुर्थी तिथि का चंद्र व्यापिनी होना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह है कि संध्या के समय चंद्रमा का उदय होना अनिवार्य है। इसी शास्त्रीय गणना के आधार पर यह व्रत 14 सितंबर को ही मान्य होगा। इस दिन रोहिणी नक्षत्र के साथ चतुर्थी के चंद्रमा का पूजन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।

चंद्र दोष से मुक्ति और सुख-समृद्धि

मान्यता है कि चौरचन के दिन चंद्रमा के दर्शन करने से व्यक्ति को चंद्र दोष से मुक्ति मिलती है। पूजा के दौरान श्रद्धालु अपने हाथों में दही, फल और विभिन्न प्रकार के पकवान लेकर चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से चंद्रमा प्रसन्न होते हैं और भक्त के घर में धन, वैभव और लक्ष्मी का वास होता है। लोक परंपरा में इसे चांद पर लगे कलंक को दूर करने के प्रतीक के तौर पर भी देखा जाता है।

ऐतिहासिक कथा और हेमांगद ठाकुर का योगदान

चौरचन पर्व की शुरुआत को लेकर कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता यह भी है कि इसकी शुरुआत कर्नाट वंश के अंतिम राजा हरिसिंह देव के कार्यकाल में हुई थी, जिन्होंने मिथिला में पंजी व्यवस्था लागू की थी। हालांकि, सबसे चर्चित कहानी 16वीं सदी के मिथिला नरेश हेमांगद ठाकुर से संबंधित है। प्रचलित कथाओं के अनुसार, दिल्ली के बादशाह ने कर न देने के कारण हेमांगद ठाकुर को चोरी के झूठे आरोप में बंदी बना लिया था।

बंदी जीवन के दौरान हेमांगद ठाकुर ने अपनी गणितीय और खगोल शास्त्रीय प्रतिभा का परिचय देते हुए आगामी 500 वर्षों के सूर्य और चंद्र ग्रहण की सटीक गणना कर दी। उनकी विद्वता देखकर बादशाह दंग रह गए और उन्हें तत्काल रिहा कर दिया, साथ ही मिथिला को कर-मुक्त घोषित कर दिया।

रानी हेमलता की भूमिका और वर्तमान परंपरा

जब राजा हेमांगद ठाकुर सकुशल वापस मिथिला पहुंचे, तो उनकी पत्नी रानी हेमलता ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि आज हमारा चांद कलंक मुक्त हो गया है। उस दिन भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि थी। रानी हेमलता ने ही इस कलंकित चांद की पूजा को सार्वजनिक रूप से आरंभ करने का श्रेय लिया और इसे आम जनता का पर्व बना दिया। तभी से मिथिला में 'उगल चांद लपकल पूरी' की अद्भुत परंपरा चली आ रही है। घर के आंगन में होने वाली इस पूजा में खीर, पूरी, पिडुकिया, खाजा और दही का विशेष महत्व है, जो भगवान को भोग के रूप में अर्पित किए जाते हैं।

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