जामिया मिल्लिया इस्लामिया के जे-के गर्ल्स हॉस्टल में बवाल, मेस की बदहाली को लेकर छात्राओं ने खोला मोर्चा

दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के जम्मू-कश्मीर गर्ल्स हॉस्टल में मेस व्यवस्था को लेकर छात्राओं ने बड़ा प्रदर्शन किया है। छात्राओं का आरोप है कि प्रशासन ने लिखित समझौते के बाद भी अपनी शर्तों को पूरा नहीं किया और उन्हें परेशान किया जा रहा है।

जामिया के गर्ल्स हॉस्टल में मेस को लेकर मचा घमासान

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया के जम्मू-कश्मीर गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली छात्राओं ने मेस प्रबंधन की कार्यप्रणाली के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन किया है। छात्राओं का साफ कहना है कि मेस की बदहाल स्थिति और प्रशासन द्वारा किए गए वादों से मुकर जाने के कारण उन्हें सड़कों पर उतरना पड़ा है। प्रदर्शनकारी छात्राओं ने प्रशासन पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि पूर्व में हुए एक लिखित समझौते के बावजूद प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के बजाय छात्राओं को नजरअंदाज करना जारी रखा है।

प्रशासन पर वादाखिलाफी का आरोप

छात्राओं ने बताया कि पिछले प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने उनकी मुख्य मांगों को लिखित रूप में स्वीकार किया था और आश्वासन दिया था कि उन्हें जल्द लागू कर दिया जाएगा। हालांकि, जैसे ही समय बीता, प्रशासन अपने वादों से पीछे हट गया। छात्राओं की प्रमुख मांगों में मौजूदा मेस ठेकेदार का कॉन्ट्रैक्ट तत्काल प्रभाव से समाप्त करना, मेस में केवल महिला कर्मचारियों की नियुक्ति करना, हॉस्टल की प्रोवोस्ट और वार्डन का इस्तीफा और प्रदर्शन में शामिल होने वाली किसी भी छात्रा के खिलाफ कोई दंडात्मक प्रशासनिक कार्रवाई न करना शामिल है।

11 सितंबर से फिर शुरू हुआ विरोध

छात्राओं का कहना है कि 11 सितंबर को उन्हें एक बार फिर विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा क्योंकि उन्हें दी गई सुविधाएं पूरी तरह ठप हो गई थीं। उनके अनुसार, शुक्रवार की सुबह उन्हें नाश्ता नहीं दिया गया और दोपहर का भोजन भी बहुत देरी से, यानी शाम 3 बजे के बाद परोसा गया। सबसे आपत्तिजनक बात यह रही कि भोजन परोसने के दौरान मेस में पुरुष कर्मचारी मौजूद थे, जबकि छात्राओं की स्पष्ट मांग थी कि वहां केवल महिला कर्मचारियों को ही रखा जाए। इसके अलावा, उनसे भोजन लेते समय नाम और मोबाइल नंबर मांगा गया, जिसका छात्राओं ने कड़ा विरोध किया। उनका डर है कि इस जानकारी का उपयोग प्रदर्शनकारी छात्राओं की निगरानी करने या उन्हें भविष्य में निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।

ठेकेदार बदलने का दावा भी निकला खोखला

छात्राओं ने आरोप लगाया है कि मेस का ठेकेदार वास्तव में बदला ही नहीं गया है। वे दावा करती हैं कि उसी व्यक्ति को दूसरे नाम से काम करने की छूट दी गई है। यह वही ठेकेदार है जो वर्ष 2023 से हॉस्टल की मेस सेवा से जुड़ा है और पूर्व में भी छात्राओं ने उसके काम के तौर-तरीकों को लेकर शिकायतें की थीं। इसके साथ ही, पुरुष कर्मचारियों को हटाने के वादे के नाम पर प्रशासन ने केवल दिखावा किया। तीन पुराने पुरुष कर्मचारियों को हटाने की जगह वहां अन्य पुरुष कर्मचारियों की तैनाती कर दी गई, जो छात्राओं की सुरक्षा और निजता की मांग का सीधा उल्लंघन है।

एआईएसए (AISA) ने प्रशासन पर लगाया डराने-धमकाने का आरोप

इस पूरे मामले में एआईएसए (AISA) की जामिया यूनिट के सचिव सौरभ ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने प्रशासन के रवैये को दमनकारी बताते हुए कहा कि छात्राओं ने लंबे समय से खराब गुणवत्ता वाले भोजन की शिकायत की थी, लेकिन उन्हें समाधान देने के बजाय डराया और धमकाया गया। सौरभ ने बताया कि प्रोवोस्ट निखत और वार्डन की ओर से छात्राओं पर लगातार दबाव बनाया जा रहा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन छात्राओं के अभिभावकों ने प्रशासन से संपर्क किया, उन्हें भी हॉस्टल से बाहर निकालने की धमकी दी गई। यह विरोध प्रदर्शन रात के करीब 9:30 बजे सेंचुरी गेट पर शुरू हुआ और लगभग 4 से 5 घंटे तक चला।

समझौते के बाद क्यों बढ़ी नाराजगी

प्रदर्शन के दौरान स्थिति को नियंत्रित करने के लिए डीन ऑफ स्टूडेंट्स वेलफेयर, प्रोवोस्ट और डिप्टी प्रॉक्टर की एक टीम छात्राओं से मिलने पहुंची थी। उस समय सभी चार मांगों को लेकर एक लिखित समझौता हुआ था और उस पर हस्ताक्षर भी किए गए थे। हालांकि, समझौते की स्याही सूखने से पहले ही छात्राएं फिर से ठगा हुआ महसूस करने लगीं। मेस में खाने की भारी किल्लत और पुरुष कर्मचारियों की उपस्थिति ने आग में घी डालने का काम किया। छात्राओं ने यह भी आरोप लगाया कि प्रदर्शन के दौरान वहां तैनात प्रोटोकॉल टीम ने सेंचुरी गेट की लाइट्स बंद कर दी थीं, ताकि छात्राओं के मन में डर पैदा किया जा सके।

छात्राओं की मांगें अभी भी जस की तस

फिलहाल प्रदर्शनकारी छात्राएं अपनी चारों प्रमुख मांगों पर अडिग हैं। उनका कहना है कि जब तक ठेकेदार का अनुबंध रद्द नहीं होता, महिला कर्मचारियों की तैनाती पक्की नहीं होती, प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी इस्तीफा नहीं देते और छात्राओं के खिलाफ विच हंटिंग (किसी को निशाना बनाकर परेशान करना) बंद नहीं होती, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा। पिछले साल जामिया में हुई अन्य विवादित घटनाओं की तरह ही यह मेस विवाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

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