बिहार के सारण जिले के किसान अब कृषि के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग कर रहे हैं। यहां के किसान न केवल आधुनिक कृषि तकनीकों को अपना रहे हैं, बल्कि उनका झुकाव जैविक और प्राकृतिक खेती की तरफ भी तेजी से बढ़ रहा है। कृषि वैज्ञानिकों से उचित प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, ये किसान खेती में लगने वाली लागत को कम करने और फसलों के उत्पादन को बढ़ाने में बड़ी सफलता हासिल कर रहे हैं। सारण जिले के गरखा प्रखंड के अंतर्गत आने वाले मिठेपुर गांव के रहने वाले किसान विष्णु सिंह उर्फ मुरारी सिंह भी एक ऐसे ही प्रगतिशील किसान हैं, जिन्होंने अपनी सूझबूझ से खेती की तस्वीर बदल दी है। वह बड़े पैमाने पर विभिन्न प्रकार की नकदी और पारंपरिक फसलों की खेती करते हैं और रासायनिक खादों के बिना ही बंपर पैदावार ले रहे हैं।
वैज्ञानिक प्रशिक्षण के बाद बदला खेती का पारंपरिक तरीका
विष्णु सिंह उर्फ मुरारी सिंह बताते हैं कि पहले वे भी अन्य किसानों की तरह रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर पूरी तरह निर्भर थे, जिससे खेती का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा था। लेकिन जब उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से विशेष प्रशिक्षण लिया, तो उनकी सोच पूरी तरह बदल गई। वैज्ञानिकों से मिले मार्गदर्शन के बाद उन्होंने जैविक और प्राकृतिक खेती की राह चूने का निर्णय लिया। अब वे अपने खेतों के लिए आवश्यक जैविक खाद और घोल खुद अपने घर पर ही तैयार करते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि उन्हें अब बाजार से महंगी रासायनिक खादें खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे उनके पैसों की बड़ी बचत हो रही है। जैविक खाद के उपयोग से न केवल मिट्टी की सेहत में सुधार हो रहा है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विष्णु सिंह की इस सफलता को देखकर आसपास के गांवों के किसान भी काफी प्रभावित हो रहे हैं। वह दूसरे किसानों को भी इस तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और बिना किसी शुल्क के उन्हें जैविक खाद तथा घोल तैयार करने की पूरी विधि सिखा रहे हैं।
घर पर वेस्ट डीकंपोजर से जैविक घोल बनाने की पूरी विधि
विष्णु सिंह मुख्य रूप से वेस्ट डीकंपोजर की मदद से एक बेहद असरदार जैविक घोल तैयार करते हैं। इस घोल को बनाने की विधि बहुत ही सरल और सस्ती है, जिसे कोई भी किसान आसानी से अपने घर पर अपना सकता है। इस घोल को तैयार करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:
- सबसे पहले एक बड़े बर्तन या ड्रम में लगभग 100 लीटर पानी लिया जाता है।
- इस पानी में करीब 1 किलो गुड़ को अच्छी तरह से घोल दिया जाता है, जो बैक्टीरिया के लिए पोषण का काम करता है।
- इसके बाद, इस मीठे पानी के मिश्रण में वेस्ट डीकंपोजर का कल्चर मिलाया जाता है।
- कल्चर मिलाने के बाद, पूरे घोल को एक साफ डंडे की मदद से नियमित रूप से सुबह और शाम घुमाया जाता है।
- मौसम और वातावरण के तापमान के आधार पर यह घोल कुछ ही दिनों में पूरी तरह से बनकर तैयार हो जाता है और इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो जाता है।
खेतों में उपयोग करने की सरल तकनीक
इस तैयार जैविक घोल का उपयोग फसलों पर कई तरह से किया जा सकता है। विष्णु सिंह के अनुसार, किसान इस घोल का छिड़काव सीधे अपनी फसलों की पत्तियों पर कर सकते हैं। इसके अलावा, खेत की सिंचाई करते समय सिंचाई के पानी के साथ मिलाकर भी इस घोल को सीधे मिट्टी तक पहुंचाया जा सकता है। यह घोल पौधों को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है और मिट्टी की ऊर्वरक क्षमता को प्राकृतिक रूप से बढ़ाता है। इसका प्रयोग नकदी फसलों जैसे सब्जियों और पारंपरिक फसलों जैसे धान, गेहूं आदि सभी में बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है।
बार-बार खाद खरीदने के झंझट से मुक्ति
विष्णु सिंह ने इस तकनीक की एक और बड़ी विशेषता साझा की। उन्होंने बताया कि किसानों को हर बार नया घोल बनाने के लिए नया कल्चर खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है। जब एक बार जैविक घोल पूरी तरह तैयार हो जाता है, तो उसमें से थोड़ा सा घोल बचाकर रख लिया जाता है। इसके बाद जब भी नया घोल बनाना हो, तो नए पानी और गुड़ के मिश्रण में इसी पुराने घोल की थोड़ी सी मात्रा मिलाकर दोबारा नया जैविक घोल तैयार किया जा सकता है। इस आसान प्रक्रिया को किसान लगातार बार-बार दोहरा सकते हैं। इससे किसानों को नाममात्र की लागत में भारी मात्रा में जैविक खाद मिलती रहती है। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि हमारे देश के किसान अपने पास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का सही ढंग से प्रबंधन और उपयोग करना सीख लें, तो वे रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले अपने भारी-भरकम खर्च को बचा सकते हैं और अपनी खेती को घाटे से उबारकर मुनाफे का सौदा बना सकते हैं।
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