दिल्ली में ब्रिक्स का महामंच
नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर 2026 को ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का आयोजन होने जा रहा है, जिसे लेकर वैश्विक गलियारों में हलचल तेज है। इस आयोजन पर सबसे ज्यादा नजर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की है। भारत इस वर्ष ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और मेजबान के रूप में दिल्ली इस महासम्मेलन के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि, ब्रिक्स के इस आयोजन को लेकर वॉशिंगटन की चिंताएं लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिका के लिए यह केवल एक बैठक नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक ढांचे में हो रहे बड़े बदलावों का संकेत है।
ट्रंप की नाराजगी और टैरिफ की धमकी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ब्रिक्स को लेकर अपनी असहजता कई बार सार्वजनिक कर चुके हैं। ट्रंप का मानना है कि ब्रिक्स का विस्तार और डॉलर के विकल्प तलाशने की कोशिशें अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व को सीधे चुनौती दे रही हैं। ट्रंप ने पिछले काफी समय में ब्रिक्स देशों को लेकर सख्त रुख अपनाया है:
- नवंबर 2024 में डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि यदि ब्रिक्स देश अमेरिकी डॉलर को हटाने के लिए किसी साझा मुद्रा का निर्माण करते हैं, तो अमेरिका उन पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगा सकता है।
- जनवरी 2025 में उन्होंने एक बार फिर अपनी इस चेतावनी को दोहराया।
- फरवरी 2025 में ट्रंप ने स्पष्ट किया कि डॉलर के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ करने पर भारी शुल्क का सामना करना पड़ेगा।
- जुलाई 2025 में उन्होंने उन देशों के लिए अतिरिक्त 10 फीसदी टैरिफ की घोषणा की जो ब्रिक्स की कथित अमेरिका विरोधी नीतियों में भागीदार बनेंगे।
ट्रंप के लिए ब्रिक्स महज एक व्यापारिक गुट नहीं है, बल्कि यह उनकी नजर में अमेरिकी आर्थिक शक्ति और डॉलर की बादशाहत (Dollar dominance) को चोट पहुंचाने वाली एक मुहिम के रूप में देखा जा रहा है।
अमेरिका क्यों है परेशान
ब्रिक्स का दायरा पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका है। अब इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के अलावा ईरान जैसे कई महत्वपूर्ण देश शामिल हो चुके हैं। अमेरिका की चिंता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- आर्थिक और राजनीतिक पहुंच: ब्रिक्स का विस्तार इसे एक बड़ा भू-राजनीतिक शक्ति केंद्र बना रहा है।
- डॉलर की निर्भरता कम करना: सदस्य देशों द्वारा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने और भुगतान प्रणालियों (payment systems) को विकसित करने की चर्चा अमेरिका को विचलित कर रही है।
- वैकल्पिक भुगतान प्रणाली: अमेरिका को डर है कि यदि ब्रिक्स ने एक वैकल्पिक वैश्विक वित्तीय तंत्र खड़ा कर लिया, तो उस पर निर्भरता कम हो जाएगी।
हालांकि, भारत का रुख बहुत स्पष्ट और परिपक्व है। भारत ने हमेशा से यही संदेश दिया है कि ब्रिक्स किसी भी तरह से अमेरिका विरोधी या पश्चिमी देशों के खिलाफ कोई गठबंधन नहीं है। भारत इसे ग्लोबल साउथ (Global South) की आवाज को बुलंद करने और व्यावहारिक आर्थिक सहयोग के मंच के तौर पर देखता है।
ईरान की मौजूदगी और वैश्विक समीकरण
इस सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ईरान वर्तमान में अमेरिका के सख्त प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, ऐसे में उसका ब्रिक्स मंच पर होना वॉशिंगटन के लिए किसी संकेत से कम नहीं है। भारत के सामने चुनौती यह है कि वह ईरान, रूस और चीन जैसे देशों के साथ सामंजस्य बिठाते हुए अमेरिका के साथ अपने सामरिक और आर्थिक संबंधों में संतुलन कैसे बनाए रखता है।
ब्रिक्स बैंक: डॉलर के विकल्प की नींव?
ब्रिक्स की असली ताकत उसके संस्थानों, विशेष रूप से न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) में निहित है। वर्ष 2015 में स्थापित यह बैंक विकासशील देशों की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं और सतत विकास के लिए वित्तपोषण का एक मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है।
भारत के विकास में NDB की भूमिका
न्यू डेवलपमेंट बैंक ने भारत के विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में बड़ी भूमिका निभाई है। मार्च 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, NDB ने भारत में 32 प्रमुख परियोजनाओं के लिए लगभग 9.5 अरब डॉलर की मंजूरी दी है। ये निवेश निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं:
- शहरी परिवहन: दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ RRTS परियोजना के लिए 500 मिलियन डॉलर की फंडिंग।
- कनेक्टिविटी: असम में दो बड़े पुलों के निर्माण के लिए 633.8 मिलियन डॉलर आवंटित किए गए हैं।
- स्वच्छ ऊर्जा: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए 300 मिलियन डॉलर की सहायता प्रदान की गई है।
- आधारभूत संरचना: इसके अतिरिक्त पानी, सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए भी व्यापक निवेश किया गया है।
निष्कर्ष: भारत की कूटनीतिक परीक्षा
ब्रिक्स अभी डॉलर को पूरी तरह से बदलने की स्थिति में नहीं है और न ही भारत ऐसा कोई कदम उठा रहा है जिससे वैश्विक वित्तीय प्रणाली अस्थिर हो। भारत का जोर द्विपक्षीय व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग और डिजिटल भुगतान कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने पर है। दिल्ली सम्मेलन में भारत की सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक मंच पर अपनी नेतृत्व क्षमता को सिद्ध करना, ग्लोबल साउथ के हितों की रक्षा करना और साथ ही अमेरिका जैसे मित्र राष्ट्रों के साथ कूटनीतिक संतुलन को बनाए रखना है। यह सम्मेलन न केवल ब्रिक्स के भविष्य के लिए, बल्कि वाशिंगटन और दिल्ली के संबंधों के नए अध्याय के लिए भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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